०१० स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (७) December 9, 2019 By Arun Aryaveer Download प्रथम समुल्लास भाग (७) प्रश्न संज्ञा ‘मित्र’ सखा को कहिये, ईश अर्थ मंह क्यों पुन गहिये। इन्द्रादिक देवन के कर्मा, जग विख्यात सबहुं के धर्मा। ग्रहण करें साधारण अर्था, ईश अर्थ मँह अर्थ अनर्था। उत्तर अहो मित्र यह भूल तुम्हारी, बात न तुमने उचित उचारी। मित्र वही जो सब का प्यारा, सब के कष्ट निवारण हारा। जग मँह साँचा मित्र न कोई, आज मित्र कल शत्रु सोई। इस का मित्र अपर का वैरी, केवल एक प्रभु निर्वैरी। ताँते ग्रहण करो भगवाना, उसके बिना मित्र नहीं आना। ‘९िामिदा’ धातु अर्थ सनेहा, औणादिक ‘क्त्र’प्रत्यय एहा। ‘मित्र’ शब्द एवं विध सिद्धा, ‘ईश्वर’ सखा अर्थ परसिद्धा। दोहा जो सब से प्रीति करे, सब सों राखे प्यार। वह सांचा प्रभु मित्र है, स्वारथ का संसार।। चौपाई ‘वृ९ा्’ वरणे ‘वर’ इप्सा जानो, प्रत्यय ‘उनन्’ उणादि पछानो। ‘वरुण’ शब्द एहि भाँति बनाया, योगी जन तब ध्यान लगाया। योगाभ्यासी जाको वरहीं, मुक्ति हेतु तपस्या करहीं। अथवा वरहि जो भक्त जनन को, शान्त करे भक्तन के मन को। वह जगदीश्वर ‘वरुण’ कहावे, जो ध्यावे सो मुक्ति पावे। दोहा अन्यायी जो नर नहीं, सब सों करते न्याय। वे मानो प्रभु अर्यमा, करते सदा सहाय।। चौपाई स्वारथ जंगम जग को आतम, सूर्य प्रकाश रूप परमातम। ‘अत’ धातु सातत्य गमन में, ‘आतम’ शब्द सुअर्थ रमन में।। जीव प्रकृति आकाश समूचे, इन सब ते परमातम ऊचे। अति सूक्षम वह अन्तरयामी, सो परमातम सब का स्वामी। परमैश्वर्यवान परमेश्वर, सकल समर्थवान सर्वेश्वर। ‘सविता’ प्राणि मात्र उत्पादक, ‘षु९ा्’ अभिषवे अर्थ प्रतिपादक। ‘ष्ङ्’ धातु से सविता जाने, गर्भ विमोचन अर्थ प्रमाने। गर्भ विमोचहि अरु उपजावहि, जांते प्रभु सविता कहलावहि। दोहा ‘दिवु’ धातु व्याकरण मँह, राखे अर्थ अनेक। सुनिये ध्यान लगाय के, अर्थ कहें प्रत्येक।। चौपाई क्रीड़ा विजगीषा व्यवहारा, द्युति स्तुति मोदहु देने वारा। गति कान्ति मद स्वप्नहु प्यारे, जानहु अर्थ ‘दिवु’ के सारे। अद्भुत प्रभु ने खेल रचाया, नाँही भेद किसी ने पाया। जय चाहे वह धर्मी जन की, विजगीषा ईश्वर के मन की। कर्म हेत सब साधन दाता, ज्योतिर्मय परकाश प्रदाता। स्तुति योग आनन्द स्वरूपा, मद भंजन भूपन को भूपा। प्रलयंकर और रात्रि कर्ता, सुख सुलाय सब दुःख को हर्ता। ज्ञान रूप सुन्दर कमनीया, वह भगवान देव रमणीया। प्रभु खेले निज आनँद माँही, जीव जन्तु उससे सुख पाँही। सब कँह जीते स्वयं अजेया, अगम अगोचर अरु अज्ञेया। पाप पुण्य कँह जाननहारा, सब व्यवहार बताने वारा। विश्व प्रकाशक शंसा योगा, सुख स्वरूप देवहि मुद भोगा। नाशहि जगत प्रलय जब आवे, कारण जग मँह सबहिं सुलावे। जो कमनीय काम्य इक देवा, जाकी ऋषि मुनि करते सेवा। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)