००३ स. प्र. कवितामृत भूमिका भाग (२) November 20, 2019 By Arun Aryaveer Download सत्यार्थ प्रकाश भूमिका भाग (२) प्रश्न महाराज इक संशय भारी, यह शंका मम करो निवारी। ग्रन्थारम्भ आपने कीना, प्रथम मंगलाचरण न दीना। ग्रन्थकार हौं देखे जेते, मंगलचार लिखें सब तेते। ग्रन्थ आदि मध्य रु अवसाने, सब मँह मंगलाचरण लखाने। उत्तर मङगलाचरणं शिष्टाचारात् फल दर्शनाच्छुतितश्चेति। सांख्य दर्शन। – अ० ५। सू० १ सांख्य शास्त्र ने ऐसा गाया, प्रथम सूत्र पंचम अध्याया। उचित नहीं यह मंगलचारा, भेड़ चाल सा यह व्यौहारा। आदि मध्य अरु अन्त स्थाने, मंगलचार उचित जो माने। तो उनके जो मध्य ठिकाना, उन महँ आदि मध्य अवसाना। उन ठौरन मँह रहे अमंगल, इन बातों से होय न मंगल। सुनहु तात हौं तोहे समझाऊँ, सांख्य शास्त्र का भाव बताऊँ। सत्य न्याय अरु वेदनुकूला, पक्षपात को कर निर्मूला। प्रभु आज्ञा अनुकूलाचारा, जो आचरहि सो मंगलचारा। इस विध आदि अन्त परयन्ता, लिखे ग्रन्थ साँचा श्री मन्ता। ऐसा मंगलाचरण कहावे, जो जन लिखे सो सिद्धि पावे। तैत्तिरेय ऋषि की यह बानी, क्या सुन्दर उपयुक्त बखानी। ‘‘यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि’’ – तैत्तिरीयोपनिषत् प्र० ७ । अनु० १६ सुनहु कर्म जो धर्मनुसारा, नित्य करहु उनका व्यवहारा। वरु मैंने इस पुस्तक माँहीं, रखी बात कोऊ ऐसी नाहीं। इष्ट ना काहू को भरमाना, नहीं काहू को चित्त दुखाना।। कुण्डलिया मनुष जाति की उन्नति, अरु होवे उपकार। लिखने में इस ग्रन्थ के, यही भाव आधार।। यही भाव आधार, सत्य को सब जन धारें। निर्मल कर के चित्त, झूठ को मन से टारें।। बिना सत्य उपदेश न होवे नरन समुन्नति। केवल यही विचार मनुष जाति की उन्नति।। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो)