००२ स. प्र. कवितामृत भूमिका भाग (१) November 12, 2019 By Arun Aryaveer Download ओ३म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः सत्यार्थ प्रकाश भूमिका भाग (१) दोहा सत्य अर्थ प्रकाश हित, या सत्यार्थ प्रकाश। जगे जोति नित सत्य की, झूठ तिमिर का नाश।। चौपाई सदा सत्य को सत्य बखाने, अरु मिथ्या को मिथ्या माने। सत्य अर्थ को यही प्रकाशा, होय जगत में सत्य विकाशा।। सत्य स्थान पर झूठ प्रकाशे, वह नर झूठा सत्य प्रणाशे। जो जैसा जग माँहि पदारथ, वाको वैसा लिखे यथारथ।। शुद्ध सत्य यह बात कहावे, सत्य पुरुष का चरित बनावे। अधम पुरुष जो है पखपाती, सत्य बात नहीं उसे सुहाती।। निज असत्य को सत कर माने, पर का साँचहु झूठ प्रमाने। वे नहीं सत्य प्राप्त कर पाते, वे दुःख सागर गोते खाते।। दोहा सद्ग्रंथन निर्माण कर, अथवा दे उपदेश। सुजन आप्त देते रहे, सदा सत्य सन्देश।। चौपाई सुन उपदेश झूठ जन त्यागे, सुख स्वरूप सत्यहुं अनुरागे। मानुष का आतम बहु ज्ञानी, जान सके निज लाभ रु हानि।। यह आतम बहु जाननहारा, झूठ साँच कर सकता न्यारा। तौ भी लख कर निज परयोजन, धन संपति अरु वस्तर भोजन।। झूठे मारग में झुक जाये, करे दुराग्रह सुपथ न आये। घोर अविद्या इस में कारण, सत्य मार्ग से करे निवारण।। शिव का जिसने सिमरन कीना, मोक्ष धाम उसको प्रभु दीना। नाम शतक हौं किया बखाना, इन ते भिन्न नाम हैं नाना। पारब्रह्म के नाम अनन्ता, तुच्छ जीव पावे नहीं अन्ता। गुण अनन्त कोउ अन्त न आवे, कहा कीट सागर थाह पावे। कर्म स्वभाव भाव हैं नाना, हैं अनन्त नामी भगवाना। वेद शास्त्र पढ़िये हो ज्ञाना, नाम अनंत किये विख्याना। जो वेदों के जानन हारे, जानें वही पदारथ सारे। सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो)