08 सप्तम समुल्लास October 31, 2019 By Arun Aryaveer Download सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार “आर्यवीर” ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर) अथ सप्तम समुल्लास अथेश्वरवेदविषयं व्याख्यास्यामः ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते।। 1।। – ऋ0 मं0 1। सू0 164। मं0 39 ईशा वास्यमिद सर्वं यत्कि०च जगत्या०जगत्। तेन त्यक्तेन भु०जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।। 2।। – यजुः0 अ0 40। मं0 1 अहम्भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वतः। मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहंदाशुषे वि भजामि भोजनम्।।3।। – ऋ0 मं0 10। सू0 48। मं0 1 अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽवतस्थे कदा चन। सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न में पूरवः सख्ये रिषाथन।। 4।। – ऋ0 मं0 10। सू0 48। मं0 5 अहं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्र२ कृणवं मह्यं वर्धनम्। अहं भुवं यजमानस्य चोदिताऽयज्वनः साक्षि वि९वस्मिन्भरे।। 5।। – ऋ0 मं0 10। सू0 49। मं0 1 दोहा जिस ईश्वर के दिव्य हैं, गुण अरु कर्म सुभाय। जो वाको माने नहीं, सो मूरख पछताया।। चौपाई सूरज चन्द्र नखत अरु तारे, जाके अन्दर बसते सारे। नभ सम व्यापक देवन देवा, जो नर करहि न वाकी सेवा। नहीं जानें वाको नहीं माने, नास्तिक वे नर मूढ़ अजाने। जानें वाको गुणी अरु ज्ञानी, सुख पावें ईश्वर सम्मानी। प्र९न चतुर्वेद में देखिये, ईश्वर लिखे अनेक। क्या तुम नाना मानते, अथवा मानहु एक।। उत्तर वेदों में एके९वर वादा, नहीं अनेक को कहीं संवादा। अनिक देव देवन के नामा, वेदों मे आये अभिरामा। अर्थ न जान तुम्हें भई शंका, सुनहु अर्थ सांचे मतिरंका। दिव्य गुणों के कारण देवा, नहीं ई९वर सम इनकी सेवा। जिमि इक देव भूमि है मानी, वरु नहीं पूजहिं वाको ज्ञानी। यथा लिखा या मंतर माँही, सर्व देव प्रभु माँहि बसाहीं। वही उपास्य अरु है ज्ञातव्या, वाकी पूजा है कर्त्तव्या। देव शब्द जिस थल पर भाया, ई९वर अर्थ वहीं अपनाया। इसी भूल से समझ न पाये, इसी भूल ने आर्य्य गिराये। यही भूल जड़ देव पुजाये, ऐसे गिरे कि उठ नहीं पाये। ई९वर सब देवों को देवा, ऋषि मुनि जाको पाँय न भेवा। उत्पति प्रलय थिति को कर्ता, वह त्राता सुख कर्ता भर्त्ता। दोहा त्रयस्त्रिंश इस मंत्र पर, शत पथ कियो बखान। लिखे स्पष्ट तेतिस वहां, देव बड़े बलवान। चौपाई भूजल अग्नि पवन आकाशा, चन्द्र सूर्य्य अरु नखत प्रकाशा। इन आठों में सृष्टि समाई, अष्ट वसु तिहि संज्ञा पाई। प्राण अपान उदान समाना, कूर्म कृकल अरु नाग व्याना। देव दत्त जीवात्म धनंजय, ग्यारह रुद्र कहाते हैं यह। देह त्याग कर जब यह जावें, सब प्राणिन तिस काल रुलावें। द्वादश मास वर्ष में आवें, वह बारह आदित्य कहावें। सब की आयु खाने हारे, यह आदित्य कहाने वारे। इन्द्र नाम विद्युत का कहिये, बिजली सों सुख संपति गहिये। यज्ञ शब्द का अर्थ प्रजापति, यज्ञ किये ते निरुज निरापति। शुद्ध होय जल वायु वृष्टि, रोग रहित हो सारी सृष्टि। विद्वज्जन का हो सत्कारा, शिल्प कला का वधीन हारा। सकल प्रजा का पालन कर्त्ता, ताँते यज्ञ लोक दुख हर्ता। ऊपर लिखित गुणों के हेतु, भव दुख पार गमन को सेतु। इन का स्वामी ईश महाना, चौतिसवां सब से बलवाना। इन देवन का वही नियन्ता, चेतन ब्र२ अनादि अनन्ता। वह उपास्य कोई और न दूजा, समुचित केवल वाकी पूजा। शतपथ काण्ड चतुर्दश देखें, स्पष्ट लिखे नयनों अवलेखें। सब शास्त्रों ने ऐसा माना, पढ़े तो होय सत्य को भाना। ईशावास्य मंत्र के अंदर, स्वयं कहें प्रभु सुन ले हे नर। दोहा जग में व्यापक जो प्रभु, वहीं नियन्ता आप। परवस्तु मत ग्रहण कर, डर उससे निष्पाप।। चौपाई कुछ नहीं था जब मैं था केवल, मैं जगस्वामी मैं निर्केवल। मैं जग कारण सत्य सनातन, सब धन विजयी पूर्ण पुरातन। पितु समान मैं सब का प्यारा, तिस पाया जिस मुझे पुकारा। मैं सब खान पान का दाता, मैं रक्षक पालक परित्राता। दोहा जग प्रकाशक सूर्य्य सम, मेरी होय न हार। नहीं मरता मैं अति बली, मैं सृष्टि कर्त्ता।। चौपाई धन विज्ञान मुझी से याचहु, मेरे प्रेम रंग में राचहु। सात्त्विक मानुश हैं मम प्यारे, वही ज्ञान धन पाने हारे। अहं ब्रह्म मैं वेद प्रकाशक, वेद सत्य अरु ज्ञान उत्पादक। सज्जन का प्रेरक मोहे जानो, मोहे यज्ञ फल दाता मानो। विश्व मात्र का कर्ता धर्ता, केवल मैं सब का दुख हर्ता। मोहि त्याग कोउ अन्य न पूजो, मो ते अन्य उपास्य न दूजो। हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकऽआसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवायं हविषा विधेम।। 6।। – यजुः0 चौपाई दिन कर नखत चन्द्र अरु तारा, जो जन्मा अरु होने हारा। उन सब का मैं ही उत्पादक, जगदाधार सकल प्रति पादक। पृथिवी से सूरज परयन्ता, जो कछु दीखे दृश्य अनन्ता। जिसने यह संसार बनाया, अद्भुत सुन्दर खेल रचाया। सुख स्वरूप वह सब का स्वामी, वाकी भक्ति करहु निष्कामी। प्रश्न ईश्वर ईश्वर रट रहे, लेते उस का नाम। कँह देखें दीखे नहीं, कौन प्रभु को धाम।। उत्तर इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारिव्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्।। – न्याय0 अ0 1 सू0 4 चौपाई नयन त्वचा रसना अरु काना, प्राणरु मन को इन्द्रिय माना। इन्द्रिय अर्थ जुड़ें जेहि काला, हो प्रत्यक्ष ज्ञान तेहि काला। होय परन्तु निर्भ्रम ज्ञाना, भ्रांन्त ज्ञान प्रत्यक्ष न माना। अब यह विषय विचारन जोगू, मन इन्द्रिय जब हो संयोगू। गुण प्रत्यक्ष होय तिस काला, नहीं प्रत्यक्ष होय गुण वाला। दोहा आत्म सहित जब मन जुड़े, पृथिव्यादि के संग। तबहुं गुणी का ज्ञान हो, सो प्रत्यक्ष अभंग।। चौपाई हो प्रत्यक्ष जगत को भाना, रचना के जानहु गुण नाना। जब गुण जाने इस रचना के, जाने मनहुं रचयिता ताके। एहि विधि साक्षात् परमेश्वर, भये प्रत्यक्ष स्वयं सरवेश्वर। प्रथम आत्मा प्रेरत मन को, मन प्रेरे पुन इन्द्रिय गन को। बुरे भले जिस कार्य्य लगाए, उसमें जीव मग्न हो जाये। जब यह कर्त्ता कोई बुराई, चोरी जारी और ठगाई। भय लज्जा होवे तिस काला, शंका उपजे चिंता ज्वाला। जव कोउ पुण्य कर्म है करता, रोम रोम में आनँद भरता। उठा भाव यह प्रभु के द्वारा, भाव मग्न हो जीव बेचारा। दोहा शुद्ध भाव से जीव जब, धरे, प्रभु का ध्यान। उसी समय प्रत्यक्ष हों, जीव और भगवान।। चौपाई जब प्रत्यक्ष होंय भगवाना, पुन वाको क्यों नहीं अनुमाना। कार्य्य देख कारण को ज्ञाना, यह जानहु अनुमान प्रमाना। प्रश्न क्या व्यापक प्रभु आपका, घट घट माँही समाय। अथवा वह इक ठौर पर, ईश्वर कहीं बसाय।। उत्तर वह ईश्वर व्यापक जग माँहीं, कौन ठौर जँह ईश्वर नाहीं। सब को जाने अन्तर्य्यामी, घट घट वासी सब का स्वामी। जगत नियन्ता कर्त्ताधर्त्ता, प्राणि मात्र के दुख का हर्त्ता। जो कर्त्ता जिस ठौरहिं नाहीं, क्रिया हेत वहँ समरथ नाँहीं। प्रश्न न्यायवान प्रभु आप का, अथवा दीन दयाल। एक ठाँव दोनों कठिन, कहिये मुझे कृपाल।। चवचौपाई न्याय करे तो दया न होवे, दया के तो न्यायहि खोवे। पाप पुण्य जैसे कोउ कर्त्ता, न्याय दण्ड वैसा वह भर्त्ता। दया करे अपराधी छोड़े, दया न्याय के नेमहुं तोड़े। कैसे रहें उभय इक ठामा, विलग विलग दोनों के धामा। उत्तर न्याय दया इक वस्तु है, नाम भेद से दोय। इनमें अन्तर कछु नहीं, जानत हैं सब कोय।। चौपाई इन दोनों का एक प्रयोजन, वही दयालु न्यायी जो जन। देना दण्ड दया के कारण, दण्ड करे सब पाप निवारण। दुखी न होवे यह संसारा, मिट जावे सब अत्याचारा। जैसा करे सो वैसा पावे, सृष्टि मँह यह न्याय कहावे। दुष्ट चोर यदि दण्ड न पावें, लाख गुना वे पाप फैलावें। दया यदि मन माँहि तुम्हारो, भूल न मन से न्याय बिसारो। डाकू को फाँसी लटकाएं, तो लाखों के प्राण बचाएं। प्रश्न दया न्याय दो शब्द क्यों, यदि है अर्थ समान। दो शब्दों से सिद्ध है, इनमें भेद महान।। उत्तर एक अर्थ के नाम अनेका, अनिक नाम परयोजन एका। बहुत शब्द हम ऐसे पाये, शब्द कोष को मत बिसराए। सत्य झूठ दोनों हैं जग में, सम्हल सम्हल पग रखें सुमग में। देखो कितना प्रभु दयालु, सकल पदारथ देत कृपालु। यह प्रत्यक्ष न्याय है कितना, जितना करें लहें फल तितना। दुख विराग सुख राग हमारा, इसमें प्रभु की दया अपारा। अंग हीन आदिक जनजेते, प्रभु के न्याय दण्ड से तेते। इन्हें देख कर तजें कुकर्मा, चलें पुण्य पथ चरहि सुधर्मा। ताँते दया शब्द अरु न्याया, अर्थ समान शब्द पर्य्याया। प्रश्न निराकार प्रभु आपके, अथवा हैं साकार। जो वा के कर पद नहीं, क्यों कर जगदाधार।। उत्तर निराकार प्रभु प्रीतम प्यारा, नहीं कछु उसका रूप आकारा। पारब्रह्म यदि हो तनु धारी, व्याप न राखे सृष्टि सारी। व्यापक नहीं पुन किम सर्वज्ञा, तनुधारी होवे अल्पज्ञा। देहवान को लागे व्याधि, आधि व्याधि और उपाधि। रोग शोक अरु क्षुधा पिपासा, विकृत होय तनु होय निवासा। ताँते निराकार परमेश्वर, घट घट व्यापक वह सर्वेश्वर। यदि वह इन्द्रियवान साकारा, उस का कौन बनाने हारा। जे वस्तु संयोगज सारे, वे सब जुड़ते अन्य सहारे। अपने आप जुड़े नहीं कोई, जो जोड़े है ईश्वर सोई। स्वयं आप को आप सँयोगे, यदि तुम ऐसी बात कहोगे। ध्यान धरें अरु करें विचारा, निराधार यह हेतु तुम्हारा। चौपाई ताँते ईश्वर देह न धरता, सूक्ष्म अणु से जग को करता। सूक्ष्म से वह स्थूल बनावे, अणु अणु में आप समावे। प्रश्न सर्वश७ि मय ब्रह्म है, करे जो चाहे आप। रोकन हारा कौन है, वा को पुण्य न पाप।। उत्तर सर्व श७ि मय है प्रभु प्यारा, मिथ्या नहीं यह वचन तुम्हारा। पर तुम समझो जैसे भाई, प्रभु की नही वैसी प्रभुताई। सर्व श७ि मय पद के अर्था, सुनहु करहु मत अर्थ अनर्था। जग कर्त्ता प्रभु सृष्टि विधायक, कर्म करे निज विना सहायक। पुण्य पाप के फल का दाता, स्वयं ब्रह्म सब जग का त्राता। निज समरथ से सगरे काजा, पूरे प्रभु राजन को राजा। जो चाहे कैसे कर सकता, मरण चहे क्या है मर सकता। निज समान दूसर कोई ईश्वर, रच सकता क्या वह जगदीश्वर। मूरख चोर दुष्ट व्यभिचारी, क्या वह बन कर होय दुखारी। सकल स्वभाव विरोधी कर्मा, कर न सकहि यद्यपि बिसकर्मा। प्रश्न क्या ईश्वर का आदि है, अरु है वाको अन्त। अथवा मानें हम उसे, नित्य अनादि अनन्त।। उत्तर सादि नहीं वह अन्तर्य्यामी, है अनादि प्रभु सब का स्वामी। आदि न वाको कारण काला, सो अनादि ईश्वर त्रैकाला। प्रश्न क्या इच्छा है प्रभु की, क्या वाकी अभिलाषा। उत्तर प्रभु चाहे सब का भला, सब के दुख का नास।। प्रश्न भगवत् भ७ि और उपासन, क्या जीवों की पाप विनासन। जाप जपे यदि दण्ड से छूटे, अटल नियम ईश्वर का टूटे। करत क्षमा यदि नहीं भगवाना, पुन वाको क्यों धरिये ध्याना। उत्तर पूजा पाठ न पाप निवारे, पापी अवस दण्ड को धारे। भ७ि का फल औरहु भाई, सुनहु सुनाऊं ध्यान लगाई। बढ़े भजन से प्रभु सन प्रीति, मन की छूटे दुष्ट अनीति। सुधरें निज गुण कर्म स्वभावा, साहस बढ़े प्रभु गुण गावा। नशत घमण्ड नरक को धामा, पारब्रह्म दर्शन अभिरामा। स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमसनाविर शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।। 1 ।। -यजुः अ040। मं0 8 चौपाई ठौर ठौर व्यापक वह ईश्वर, भाग्यवान बलवत जगदीश्वर। सब कुछ जाने अन्तर्य्यामी, पावन शुद्ध जगत का स्वामी। सब से ऊपर वही विराजे, स्वयं सिद्ध सृष्टि को साजे। ज्ञान देत वह प्रभु पुरातन, ज्ञान लहै यह जीव सनातन। दयाधार वेदों को दीना, तम अज्ञान रूप हर लीना। सगुण प्रार्थना याको कहिये, या में ईश्वर के गुण गहिये। रूप रंग नहीं वा की काया, नाड़ी बंधन में नहीं आया। कबहुं करे नहीं पापाचारा, जिसमें नहीं क्लेश व्योहारा। इस प्रकार गुण रहित उपासन, निर्गुण पूजा भ७ि प्रकासन। ईश्वर स्तुति का फल है भारी, प्रभु अनुगत हो सृष्टिसारी। हैं गुण कर्म प्रभु के जैसे, जीवों में गुण आवें तैसे। न्याय करे ईश्वर जग ऊपर, तुम भी न्याय करो इस भू पर। जो नर मुख से कीरति गाते, मन से विषय भोग में राते। अन्यायी निर्दय अरु पापी, अत्याचारी दुष्ट सुरापी। लाभ न उसकी कीरति कीने, वे नर केवल भाँड कमीने। भ७ि करें अरु चरित सुधारे, वे नर साँचे प्रभु के प्यारे। यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते। तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।। 1।। -यजुः अ0 32। मं0 14 दोहा सो मति हमको दान कर, हे प्रकाश के रूप। जा को योगी जन गहें, सुन्दर सुगुन अनूप।। तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्य्यमसि वीर्य्यं मयि धेहि। बलमसि बलं मयि धेहि। ओजोऽस्योजो मयि धेहि। मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि।। 2।। -यजुः0 अ0 19। मं0 9 छप्पय तुम हो तेज स्वरूप, तेज पुन मुझ में धारो। वीर्य्य रूप प्रभु वीर्य्य, पराक्रम मुझ में डारे। बल स्वरूप! मुझ में कृपया धारो बलकारो। अहो ओज के रूप करो मुहि समरथ वारो। तुम दुष्टों पर क्रोध करो, क्रोध वही मोहे दीजिये। सहन शील तुम हो प्रभु, सहन शील मुहि कीजिये। यज्जाग्रतो दरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दुरङगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्में मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 3।। येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 4।। यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किं चन कर्मसिक्रयते तन्मे मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 5।। येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 6।। यस्मिन्नृचः साम यजूषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तसर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 7।। सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यन्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽइव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङकल्पमस्तु।। 8।। -यजुः अ0 34। मं0 1 – 6 छप्पय जब मैं जागूँ दूर दूर मेरा मन जाए, सोते में भी इत उत धाए सदा लुभाए। अनुकंपा से तेर सुन्दर सद्गुण पाए, चमत्कार युत जिते द्रव्य तिनहूँ चमकाए। एहि विधिं मन को हे प्रभो, ऐसा शुभ वरदान दो। बुरा न चितवहि किसी का, सब ही का कल्यान हो। धर्म यु७ विद्वान कर्म के करने हारे, जिससे करते यज्ञ याग अरु युद्ध सकारे। पूजनीय जो अपने अंदर समरथ धारे, प्रजा माँहि जो बसे जगत को सदा निहारे। एहि विधि मन को हे प्रभो ऐसा शुभ वरदान दे। चितहि न कभी अधर्म को धर्म करता रहे। छप्पय जो सद्गुण मय चित जगत को सतत चितावे, निश्चयात्मिक वृत्तिवान सब ठौर बसावे। नाश रहित जो प्रजा माँहि परकाश दिखावे, जा के बिन नर कोई कर्म कछु कर नहीं पावे। सो मेरो मन हे प्रभो! सद्गुण की इच्छा करे, पावन हो मल हीन हो, सगरे दुर्गुण परिहरे। छप्पय जिससे योगी हों त्रिकाल के जानन हारे, जो अविनाशी जीवहिं मेलत ब्रह्म सकारे। जिसमें ज्ञानरु क्रिया रहे पुन योग विचारे, बुद्धि आतम यु७ पंच ज्ञानेन्द्रिय वारे। सो मेरो मन योगयुत और ज्ञान भरपूर हो, नशहि अविद्या हे प्रभो! ताप क्लेश पुन दूर हो। छप्पय अहो परम विद्वान प्रभु सृष्टि के नायक, कृपा करो अब वेगि नाथ सब के सुख दायक। मेरे मन में बसें वे तव महिमा गायक, जिसमें साक्षी रूप चित्त रहता परिचायक। बेगि अविद्या नाश कर उस मेरे मन की प्रभो, प्यारा हो शुभ ज्ञान का विद्या का पुन वास हो। छप्पय पारब्रह्म परमेश्वर स्वामी जगन्नियन्ता, यह मेरो मन सारथि सम अश्वन को यन्ता। चपल चित्त गतिमान रु मानव जग दोलन्ता। हृदय माँहिं थित्त वेगवती याकी चंचलता। पाप पंथ से रोक लो सब इन्द्रिन को हे विभो, संचालहिं शुभ पंथ में एहि विधि मन की गति हो। अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउ७िं विधेम।। 1।। -यजुः अ0 40। मं0 16 कुंडलियां हे प्रकाश के रूप प्रभो सब जानन हारो, सब विज्ञान प्रदान करे सब मार्ग सुधारो। हमरे मार्ग सुधार कुपथ से हमें बचाएं, पाप गर्त में गिरें नहीं भुज पकड़ उठाएं। सकल ज्ञान भण्डार हमें इक तेरी आशा, अंधकार कर दुर प्रभो तुम रूप प्रकाशा। मा नो महान्तमुत मा नोऽअर्भकंमा नोऽउक्षन्तमुत मा न उक्षितम्। मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः।। 1 ।। -यजुः0 अ0 16। मं0 15 दोहा रुद्र रूप तुम हे प्रभु, दुष्ट रुलावन हार। प्रिय बन्धु मारें नहीं, ऐसे पथ पर डार।। असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमयेति।। -शतपथब्रा0 14। 3। 1। 30 चौपाई झूठ मार्ग से प्रभो निकालो, सन्मारग पर हम को डालो। महा अविद्या को अंधेरा, जिसने डाला जग में डेरा। उससे इनको वेगि बचाओ, ज्ञान रवि के दरस दिखाओ। मृत्यु रोग से हमें छुड़ाएं, मोक्ष सुधा रस पान कराएं। कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।। 2।। -यजुः0 अ0 40। मं0 2 दोहा शत वर्षहु लग धर्म कर, हे नर कर्म न त्याग। जो नर रहते आलसी, उनके खोटे भाग।। चौपाई इस सृष्टि में प्राणी जेते, कर्म यत्न से करते तेते। मक्खी मच्छर चींटी आदि, खाली बैठें नहीं प्रमादी। चन्द्र नखत अरु पृथिवी घूमे, बादर रूमे तरुवर झूमे। पुरुषारथ का जगत सहायक, पुरुषारथ के ईश्वर नायक। जाको दर्शन की अभिलासा, नयन करें तस पूरन आसा। अंध पुरुष को कौ दिखावे, अंधा तो कुछ देख न पावे। उपकारक के प्रभु सहायक, दुष्टन को नाहीं फल दायक। गुड़ मीठा गुड़ मीठा कहिये, गुड़ का स्वाद कभू नहीं गहिये। उसक मुख मीठा नहीं होवे, सो नर काटे जो नर बोये। उपासना जो नर रमता बीच समाधि, छूट गई जसु आधि व्याधि। दूर हुए सगरे मल जाके, शुद्ध हुए मन इन्द्रिय वाके। आतम थित हो चित्त जगाया, पारब्रह्म में मन बिरमाया। वह नर जो मन में सुख पाए, वा बाणी से कहा न जाए। मन का सुख रसना किमि जाने, गूँगा कैसे स्वाद बखाने। सोरठा आसन प्रभु के पास, या को नाम उपासना। पूरन हो यह आस, अष्ट अंग के योग से।। चौपाई सर्व वियापी अन्तर्यामी, पारब्रह्म घट घट के गामी। ऐसे रूप माँहि तिंहि देखे, मन के नयनन से अवलेखे। प्रभु दर्सन हित जो सत्कर्मा, उनका करना है सत्त धर्मा। तत्र – अहिंसासत्याऽस्तेयब्रह्मचर्याऽपरिग्रहा यमाः।। -योगशा0 साधनपादे। सू0 30 शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।। -योगशा0 साधनपादे। सू0 32 दोहा करना चहे उपासना, जिसके मन में चाह। उसके हित पातँजलि, दर्साते यह राह।। चौपाई काहू के सँग वैर न राखे, प्रीति रखे सब से सत भाखे। झूठ न बोले करे न चोरी, लंपटता की गिरे न मोरी। दोहा निज को प्रभु से भिन्न लखि, विनति होय प्रभु केर। सगुण निगुण यह प्रार्थना, विधि निषेध के फेर।। दोहा पुरुषारथ भी उचित है, विनति के अनुसार। उद्यम बिन देता नहीं, फल को फल दातार। चौपाई सद्बुद्धि हित यदि प्रभु याचो, तो सत्कर्मन में मन राचो। ताँते पहले उद्यम कीजे, पाछे मांग प्रभु से लीजे। ऐसी विनति निपट निरर्थक, इसका ईश्वर नहीं समर्थक। बुद्धिहीन मूरख जिमिकरते वृथा जन्म भर पच पच मरते। नाश करो शत्रु सब मेरे, उन पर ईश्वर बिजली गेरे। मुझ को सब से बड़ा बनाओ, मेरे गृह संपत्ति लाओ। ऐसी विनती करें अभागे, कब प्रभु उनकी सुनने लागे। दो वैरी जब करें लड़ाई, ईश्वर किससे करें मिताई। जो तुम कहो प्रीति हो जाकी, ईश्वर माने बिनति वाकी। तो प्रीति हो जिसकी थोरी, वाकी क्षील क्यों करे बहोरी। दो चहें अवर को नाशा, क्या दोउन का करें प्रणाशा। दोहा फिर तो ऐसी प्रार्थना, करन लगे संसार। सभी काम आ कर करो, मेरे गृह कर्त्तार।। चौपाई मेरी रोटी आन पकाओ, कपड़े धो कर जल्दी लाओ। बर्तन माँजो झाड़ू दीजे, आ कर में खेती कीजे। इस प्रकार जो प्रभु सहारे, बैठ रहें आलस के मारे। नष्ट होय तब तो पुरुषारथ, होय न पूरा कोई स्वारथ। दोहा उद्यम की आज्ञा दई, पुरुषों को कर्तार। जो आज्ञा को तोड़ता, वह दुख सहे गँवार।। कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।। 2।। -यजुः0 अ0 40। मं0 2 समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत्। न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा, स्वयन्तदन्तःकरणेन गृह्यते।। 1।। इन्द्रिय जित हो निर अभिमानी, कबू न बोले मद की बानी। दोहा यम हैं पांच प्रकार के, योगोपासन अंग। इनको धारण जो करे, न्हाय दर्स की गंग। शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।। -योगशा0 साधनपादे। सू0 32 चौपाई राग द्वेष तज मन को शोधे, तो नर सत्य ज्ञान अवबोधे। तनु को करे नीर से पावन, पुन निर्मल हो देह अपावन। धर्म सहित कीजे पुरुषारथ, पूरहि सब स्वारथ परमारथ। लाभ होय तो सुख नहीं जाने, हानि हो तो दुख नहीं माने। आलस तज पुरुषारथ कीजे, दुख सुख में कछु ध्यान न दीजे। केवल करे सुधर्माचारा, कबहुं करे नहीं पाप विहारा। सच्छास्त्रन को पढ़े पढ़ावे, सज्जन संगति में बिरमावे। ओं ना ईश्वर का प्यारा, जपे इसे कर अर्थ विचारा। दोहा अर्पण कर निज आत्मा, प्रभु आज्ञा ऽनुकूल। पंच नियम यह हैं कहे, यही योग के मूल।। सोरठा अहै उपासन योग, द्वितीय अंग तह यह तात। यम नियमों की क्रिया में, मग्न रहे दिन रात।। चौपाई जो तुम करना चहो उपासन, सूने स्थान जमाओ आसन। प्रणायाम करो उत जाकर, पारब्र२ में चित्त लगा कर। बाह्य विषय से इन्द्रिय रोके, ईश्वर की महिमा अवलोके। मन को नाभि कंठ हृत मांही, शिखा नेत्रा मेरु थल पाहीं। पारब्रह्म का चिंतन करिये, अवर वस्तु का ध्यान न धरिये। जब नर ऐसा साधन करता, अन्तःकरम सत्य से भरता। नित्य प्रति जब ज्ञान बढ़ाए, समय पाय नर मुक्ति पाए। दोहा आठ प्रहर में घड़ी भर, जो करता प्रभु ध्यान। वाका मन उन्नति करे, पावे पद कल्यान।। चौपाई सर्वज्ञादि गुणन के साथा, जो जन प्रभुहिं निवाए माथा। या को कहिये सगुण उपासन, सगुण भक्ति गुण सहित प्रकासन। रूप रंग रंस आदि विहीना, राग-द्वेष आदिक सो क्षीना। बाहर भीतर व्यापक ईश्वर, आतम में खेले जगदी९वर। ऐसे प्रभु में ध्यान लगाए, निगुण उपासन यह कहलाये। उपासना का फल यथा शीत से प्राणी मारा, अग्नि का जब लेत सहारा। उसका शीत कष्ट मिट जाए, अग्नि ताप अति सुख पहुँचाए। एहि विधि बैठ प्रभु के नियरे, भव दुख तप्त हृदय हों सियरे। जीव लहे गुण ब्रह्म समाना, पावन कर्म स्वभाव महाना। ताँते प्रभु की भक्ति कीजे, दुर्गुण दोष सभी तज दीजे। गिरि सम दुख में नहीं घबरावे, वह सब कष्ट सहन कर पावे। छोटी बात नहीं यह भाई, दुख का पर्वत होवे राई। दोहा जो नहीं करे उपसना, सो कृतघ्न अति नीच। तज ब्रह्मानंद मूढ़ ने, जनु गह लीनी मीच।। चौपाई जिसने सारा जगत बनाया, जाकी सदा जीव पर दाया। सकल पदारथ किये प्रदाना, अन्न फूल फल वस्तु नाना। उसको जो नर नीच भुलावे, वह कृतघ्न अति नीच कहावे। प्रश्न नहीं इन्द्रिय उस प्रभु के, नहीं नयन अरु कान। कर्म करे किस विधि प्रभु, अहो विचित्र महान।। उत्तर अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति विश्वं न च तस्याति वेत्ता तमाहुरग्र्यां पुरुषं पुराणम्।। – ९वेता९वतर उपनिषद्।। अ0 3। मं0 19 चौपाई कर नाहीं पर रचना कर्ता, श७ि रूप कर ईश्वर धर्ता। पग नाहीं व्यापक प्रभु केरे, वेगवन्त पुन सब के नेरे। नैन नहीं बिन नैन निहारे, कर्ण नहीं वच सुनता सारे। अन्तःकरण बिना जग जाने, सावधि वाकौ कौन पछाने। सर्व श्रेष्ठ अरु पूर्ण सनातन, एहि कारण वह पुरुष सनातन। जेते कारज इन्द्रिय मन के, समरथ से करता बिनु तन के । प्रश्न क्रिया हीन अरु गुण रहित, गनहिं उसे विद्वान। पर तुम उसे बखानते, सक्रिय अरु गुणवान।। उत्तर न तस्य कार्य्यं करणं च विद्यते, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य श७िर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। – ९वेता९वतर उपनिषद् अ0 6 । मं0 8 दोहा कार्य करण उसका नहीं, नहीं कोई अधिक समान। ज्ञान क्रिया भण्डार वह, प्रभु अनन्त बलवान।। चौपाई यदि ईश्वर कोई क्रिया न करता, किस विधि सृष्टि कर्ता हर्ता। क्रिया शील ईश्वर है चेतन, निष्क्रिय हो जब वस्तु अचेतन। प्रश्न क्रिया करे किस भांति की, वाको करें बखान। है अनन्ता वा सान्त वह, कहें जिसे भगवान।। उत्तर जितने देश रुकाल में, उचित लखे भगवान। उतने में ही करत है, न्यून न अधिक समान।। प्रश्न परमे९वर निज अन्त को, जानत है या नांहिं। अथवा वह नहीं जानता, तनिक इसे समझाहिं।। उत्तर पारब्रह्म सर्वज्ञ है, पूरन वाको ज्ञान । जो वस्तु जिस भांति की, सो जाने भगवान।। चौपाई प्रभु अनन्त तिस अन्त न आवे, कैसे पुन वह सान्त लखावे। सान्त वस्तु को लखे अनन्ता, उल्टा ज्ञान बुद्धि भरमन्ता। ज्ञान यथारथ दर्शन कहिये, शुद्ध विकार रहित तिस पहिये। इस से उल्टा है अज्ञाना, संशय तर्क भरे जिंहि नाना। क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।। -योगसूत्र (समाधि पादे । सू0 24) चौपाई ताँते क्लेश अविद्या सादी, कुशल अकुशल इष्ट कर्मादी। कर्म अनेक मिश्र फल दायक, जेते पापरु पुण्य सहायक। इनकी जिसे वासना नाहीं, वह ईश्वर व्यापक जग मांही। वही वासना रहित सनातन, पूरन ज्ञानी पुरुष पुरातन। ईश्वरासिद्धेः।। 1।। – सां0 अ0 1 । सू0 12 प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ।। 2 ।। – सां0 अ0 5 । सू0 10 सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ।। 3 ।। – सांख्य अ0 5 । सू0 11 दोहा कैसे ई९वर सिद्ध है, बिन प्रत्यक्ष प्रमान। नैन कान जानें नहीं, कैसे हैं भगवान।। चौपाई बिन प्रत्यक्ष न हो अनुमाना, इन के बिन नहीं शब्द प्रमाना। ताँते सिद्ध न ई९वर सत्ता, ई९वर चर्चा करें प्रमत्ता। उत्तर पारब्रह्म की सिद्धि में, नहीं प्रत्यक्ष प्रमान। उपादान कारण नहीं, जग का वह भगवान।। चौपाई पुरि पुरि माँहि पुरुष प्रभु सोवे, सकल जगत में व्यापक होवे। एहि कारण वह पुरुष कहावे, बाहर भीतर आप समावे। जीवातम सोवे तनु अंदर, यह तनु जीव पुरुष का मंदर। प्रधानश७ियोगाच्चेत्संङगापत्तिः।। 1 ।। सत्तामात्राच्चेत्सर्वैश्वर्य्यम्।। 2 ।। श्रुतिरपि प्रधानकार्य्यत्वस्य।। 3 ।। – सांख्य सू0 (अ0 5 सू0 8-9-12) दोहा मुख्य श७ि का योग यदि, होय पुरुष के संग। संगापत्ति दोष पुन, होवे पुरुष प्रसंग।। चौपाई जिमि प्रकृति पा सूक्ष्म संगत, कार्य्य रूप में हो गई परिनंगत। स्थूल रूप प्रभु का तिमि होवे, यदि प्रधान श७ि संजोवे। उपादान कारण नहीं ताते, प्रभु निमित्त कारण कहलाते। जो जग उत्पन्न हो चेतन से, जगत होय मय चेतन गुण से। जिमि प्रभु सब ऐ९वर्यों वारा, वैसा ही हो पुन संसारा। ऐसी तो यह सृष्टि नाहीं, फँसी पंच क्लेशों के माहीं। उपादान कारण नहीं ईश्वर, हैं निमित्त कारण जगदीश्वर। उपनिषदें भी यही बखाने उपादान प्रकृति को माने। अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां ब५ीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः।। -श्वेताश्वर उपनिषद् अ0 4। मं0 5।। दोहा अज सत रज तम रूपिणी, प्रकृति धरे स्वरूप। जल थल पशु प्राणी सकल, नाना वाके रूप।। चौपाई यह प्रकृति जानो परिणामिनि, नाना रूपक रंग सुहाविनि। परं पुरुष नाहीं परिणामी, निर्विकार कूटस्थित स्वामी। नांही कपिल अनीश्वर वादी, क्या जाने यह अपढ़ प्रमादी। न्याय विशेषिक अरु मीमांसा, वाकी करते यही मीमांसा। जो प्रभु व्यापक अन्तर्य्यामी, सब जीवों का आतम स्वामी। गुण सर्वज्ञ आदि जसु सारे, वे ईश्वर प्राणों से प्यारे। प्रश्न क्या प्रभु आकर सृष्टि में, लेता है अवतार। नाश पापियों का करे, टारे भू का भार।। उत्तर नहीं लेता अवतार वह, यजुर्वेद परमाना। है अकाय अव्रण प्रभु, व्यापक विभु महान।। चौपाई एक पात् अज शास्त्र बखानें, पुन अवतार कहो किम माने। प्रश्न हे अर्जुन सुन धर्म में, जब जब होवे ग्लान। तभी तभी मैं अवतरुं, कहें कृष्ण भगवान।। उत्तर वेद विरुध यह वचन हैं, ताँते नहीं प्रमान। धर्म हेत जन्मूं मरुं, कहें कृष्ण भगवान।। चौपाई धर्म मूर्ति थे मोहन प्यारे, धर्म हेत बहु दुष्ट संहारे। धर्म नाश लाख होएं अधीरा, व्यथित उठे उनके मर पीरा। सह नहीं सकें धर्म की हानि, तब निकसे मुख से यह बानी। मेरो केवल धर्म आधारा, जन्म गहूं मैं बारम्बारा। सत पुरुषों को आन बचाऊं, अरु दुष्टों का बीज नशाऊं। यही स्वप्न यह जीवन आसा, होय जगत में धर्म निवासा। धर्म हेत जिन तन मन वारा, उन के मन के यह उद्गारा। ईश सिद्ध नहीं होते याते, नहीं प्रभु का अवतार कहाते। प्रश्न सृष्टि ऐसे मानती, हैं चौबिस अवातर। ऋषि मुनि सब वाको भजें, नाम जपे संसार।। उत्तर इक जन वेद न जानते इक दीने बहकाय। इक अज्ञानी अपढ़ है, इक भ्रम लिये फँसाय।। प्रश्न यदि ईश्वर अवतार न धारे, कौन भूमि का भार उतारे। रावण कंस आदि दुःखदायी, किस विधि सगरी सृष्टि सताई। राम भये रावण को मारा, कृष्ण रूप से कंस पछारा। ताँते चौबिस भये अवतारा, दुष्टन मारा भ७न तारा। उत्तर जो जन्मे सो मरत हैं, यही प्रकृति को नेम। सदा न जग में कोउ रहे, सदा कुशल नहीं क्षेम।। चौपाई जिसने सारा जगत बनाया गिरि सागर छिन माँहि रचाया। सूरज चन्द्र नखत अरु तारे, जिसकी महिमा गाते सारे। छिन में चहे प्रलय कर डारे, क्या रावण अरु कंस बेचारे। वह व्यापक रावण के तन में, मार सके जब चाहे क्षण में। उस अनन्त का अन्त न पावे, जन्म मरण में वह क्यों आवे। रावणादि सब कीट समाना, सर्वश७ि मय प्रभु महाना। उन कीड़ों के मारण कारण, प्रभु क्यों करे देह को धारण। देह धार भ७ों को तारें, जो ऐसा मन माँहि विचारे। उनका भी नहीं उचित विचारा, संतों को पहले ही तारा। भ७ चलें प्रभु आज्ञा माँहीं, पाप दोष उनको कछु नाहीं। निज समरथ से उनको तारे, उनकी नाव लगाए किनारे। महि मण्डल रवि शशि को धर्ता, इतने बड़े जगत का कर्ता। बिन कर प्रभु ब्रह्माण्ड उठाया, अगम अगोचर अन्त न पाया। क्या बपुरा गोवर्धन धारण, कठिन नहीं रावण को मारण। प्रभु महिमा पर तनिक विचारो उसके अचरज खेल निहारो। नर चींटी प्रभु जलधि अपारा, किस विधि चींटी पावे पारा। तनिक यु७ि से सोचें मन में, व्यापक ईश्वर क्यों कर जनमे। गर्भ माँहि आकाश न आवे, नभ नहीं मुठ्ठी माँही समावे। जिमि अनन्त व्यापक आकासा, बाहर भीतर उसको वासा। नहीं कहीं आवें नहीं कहीं जावे, ओत प्रोत जग माँहि समावे। इस विधि पारब्रह्म भी जानूं, अणु अणु में व्यापक मानूं। व्यापक प्रभु गर्भ के अंदर, अणु अणु है उसका मंदर। उसका कैसा आना जाना, खाली उस से कौन ठिकाना। ज्ञान हीन बुद्धि के कोरे, जनमावें, प्रभु को मति भोरे। ईसा आदि भी नर सारे, केवल मानुष रहे बेचारे। जो उनको मानहिं अवतारा, उनके मन अज्ञान पसारा। राग द्वेष अरु क्षुधा पिपासा, दुख सुख आसा और निरासा। यह सब गुण ईशादिक माँहीं, ताँते वे नर ईश्वर नाहीं। दोहा निज भ७ों के क्या प्रभु, क्षमा करें सब पाप। अथवा उनको दण्ड दे, देते हैं संताप।। उत्तर ईश्वर न्यायाधीश है, करे न क्षमा प्रदान। पापी को शिक्षा मिले, याही में कल्याण।। चौपाई क्षमा दान से पुण्य नशावे, पापी का साहस बढ़ जावे। पापी होवे सब संसारा, क्षमा पाप का बड़ा सहारा। प्रश्न क्या यह जीव स्वतंत्र है, अथवा है परतंत्र। क्या सम्मति है शास्त्र की, क्या कहते मंत्र।। उत्तर निज कर्मों में नर स्वाधीन, जो चाहे सो करे प्रवीना। पाणिनीय ऋषि यही बखाने, जो स्वतन्त्र तिहिं कर्ता माने। ताँते कर्ता जीव स्वतंतर, प्रभु के नियम माँहि परतंतर। अटल व्यवस्था ईश्वर केरी, जीव सृष्टि सगरी जसु चेरी। प्रश्न क्या लक्षण स्वातन्त्र्य के, किस को कहें स्वतन्त्र। अथवा समझें जीव को, प्रभु का साधन यन्त्र।। उत्तर जिसके सभी अधीन हैं, मन इन्द्रिय अरु प्राण। जो स्वतन्त्र कर्ता पुरुष, वह है जीव सुजान।। चौपाई जीव स्वतन्त्र कर्म का कर्ता, पाप पुण्य के फल का भर्ता। जिमि स्वामी की आज्ञा पाकर, कर्म करे कोई किंकर चाकर। अथवा रण में लड़े सिपाई, सेनानी की आज्ञा पाई। बँधा हुआ आज्ञा के तागे, पाप पुण्य वाको नहीं लागे। त्यों प्रभु कर्म यदि करवावे, जीव बेचारा क्यों फल पावे। किंकर सम यदि जीव बेचारा, कर्म प्रभु का करने हारा। जो फल भी पावे परमेश्वर, नरक स्वर्ग भोगे सर्वेश्वर। मारनहारा फांसी पाए, कौन खङग फांसी लटकाए। पराधीन नर खङग समाना, मारन हार स्वयं भगवाना। ताँते जीव कर्म को करता, है स्वतंत्र अरु फल को भरता। ईश्वर केवल फल को दाता, जीव किये का फल है पाता। प्रश्न जीव न यदि ईश्वर उपजाता, क्यों कर जीव जगत में आता। यदि इसको नहीं देता श७ि, कर्म न कर सकता कोई व्य७ि। ताँते जीवहिं ईश्वर प्रेरे, कर्म विपाक न जीवहिं घेरे। उत्तर जन्म न ले जीवात्मा, याको रूप अनादि। तनु इसके आधीन है, करे पुण्य पापादि ।। प्रभु समान यह जीव अनादि, यह नहीं ईश्वर दत्त प्रसादी। तन मन इन्द्रिय ईश बनाये, पुन शरीर मँह जीव समाए। तनु का स्वामी जीव कहावे, पाप पुण्य के फल को पावे। जिमि कोउ गिरि ते लोह निकाले, कोऊ लोहा भट्टी में डाले। कोऊ वाकी तलवार बनाए, वँह से कोउ सैनिक ले जाए। सैनिक ने हत्या फर डाली, खङग म्यान में फेर सँभाली। तुर्त सिपाही पकड़ा जाए, राजा फाँसी पर लटकाए। नहीं खनक अरु नहीं लोहरा, नहीं दण्ड धारा तलवारा। एहि विधि तनु उत्पत्ति कर्ता, कर्म फलों को प्रभु नहीं भरता। सैनिक सम यह जीव अकेला, पाप पुण्य भोगे अलबेला। प्रश्न जीव न यदि ईश्वर उपजाता, क्यों कर जीव जगत में आता। यदि इसको नहीं देता श७ि, कर्म न कर सकता कोई व्य७ि। ताँते जीवहिं ईश्वर प्रेरे, कर्म विपाक न जीवहिं घेरे। उत्तर प्रभु तो उसको भोग भोगावे, कर्म चक्र में स्वयं न आवे। कर्म करे यदि ईश्वर भाई, पुन जग में कहँ रहे बुराई। बुरे कर्म ईश्वर नहीं करता, पाप जगत में पाँव न धरता। शुद्ध बुद्ध शुचि ईश्वर पावन, कर सकता नहीं कर्म अपावन। ताते प्रभु सम जीव स्वतंतर, फल पाने में वरु परतंतर। प्रश्न जीवेश्वर के रूप क्या, क्या गुण कर्म स्वभाव। अति गंभीर यह विषय है, मो को दें बतराय।। उत्तर दोनों चेतन रूप हैं, पावन नित्य समान। इन में जो अंतर रहे, सुन लें धर कर ध्यान।। चौपाई प्रभु उत्पति थिति परलय करता, सकल सृष्टि का धर्ता भरता। पाप पुण्य कर्मज फल दायक, सुख दायक अरु धर्म सहायक। सुख स्वरूप बल कर्म अनन्ता, सतत एक रस है भगवन्ता। जीव कर्म संतति उत्पादन, पालन पोषण ईर्ष विषादन। इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङगमिति।। -न्याय0 सू0 आ0 1 आ0 1 से 10 प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्चात्मनो लिङगानि।। -वैशेषिक सू0 अ0 आ0 3 आ0 2 सू0 4 चौपाई ‘इच्छा’ जगत वस्तु प्रापन की, खान पान पुन मान अरु धन की। सकल क्लेश आदिक से द्वेषा, चहे न मन में दुख लवलेशा। राखे स्वाभाविक पुरुषारथ साधे स्वारथ अरु परमारथ। सुख चाहे दुख नेक न भाए, बुद्धि विवेक ज्ञान अपनाए। यही जीव के जानें लक्षण, कहते ऋषि मुनि बुद्धि विचक्षण। वैशेषिक गुण कहे विशेषा, प्राणापान उन्मेष निमेषा। मन, गति, इन्द्रिय हृदय विकारा, ताते जीव प्रभु से न्यारा। इन गुण से हो आत्म प्रतीति, सूक्ष्म जीव जानन की रीति। जब लग जीव रहे या तन में, तब लग ज्योति रहे गुणन में। जब यह आत्म तनु को त्यागे, तुर्त सभी गुण नशहिं अभागे। जिसके आने से जो आवें, जिसके जाने से जो जावें। वे गुण सकल उसी के जानो, अन्य नहीं काहू के मानो। जिमि रवि हो तो हो परकाशा, रवि डूबे परकाशा विनाशा। तिमि आतम परमातम ज्ञाना, गुण द्वारा उनका हो भाना। प्रश्न वह त्रिकाला दर्शी प्रभु, रखे भविष्य ज्ञान। ईश्वर कर्त्ता जीव के, सगरे कर्म विधान। चौपाई प्रभु लीला जिमि चहे रचाये, जैसा चाहे नाच नचाये। कुछ अधीन मानुष के नाहीं, जीव चले प्रभु इच्छा माँही। ताँते प्रभु जीवहिं नहीं दण्डे, जीव स्वतंत्र नहीं ब्रह्मण्डे। उत्तर कोई त्रिकाल दर्शी कहे, प्रभु कोई मतिमान। सदा अखण्डित एक रस, वर्तमान प्रभु ज्ञान।। चौपाई जो उपजे अरु पुनः नशावे, वाकी संज्ञा भूत कहावे। जो नहीं है पर होगा उत्पन, वाको कहें भविष्यत सज्जन। क्या ईश्वर का है कोऊ ज्ञाना, होकर उत्पन फेर रहा ना। अथवा होगा अरु अब नाहीं, ऐसो ज्ञान प्रभु को नाहीं। भावी भूत जीव के काला, प्रभु का इक रस ज्ञान निराला। कर्मोपेक्षा से आतम की, त्रिकालज्ञता परमातम की। स्वतः न प्रभु त्रयकाल निरीक्षक, सदा एक रस रहे निरीक्षक। कर्ता कर्म जीव जब जैसे, प्रभु सर्वज्ञ लखे तब तैसे। पारब्रह्म पुन जैसा जाने, तिस विध कर्म जीव जिय ठाने। दोहा फल अरु ज्ञान त्रिकालका, दे स्वतन्त्र भगवान। कर्मों में स्वाधीनता, राखे जीव प्रधान।। चौपाई है अनादि ईश्वर को ज्ञाना, वाको नहीं आदि अवसाना। तैसे ही कर्मन ज्ञान अनादि, दण्डहु ज्ञान न प्रभु का सादि।। द्विविध ज्ञान ईश्वर को सांचा, इनमें एकहु होय न कांचा। ताते इसमें दोष न कोई, कर्म दण्ड का ज्ञाता सोई। प्रश्न जीव देह में विभु है, अथवा है परिच्छिन्न। क्या आतम प्रभु रूप है, अथवा उससे भिन्न।। उत्तर है परिछिन्न रूप आत्म का, विभु रूप है परमातम का। यह अल्पज्ञ जीव कहलावे, सूक्ष्म या तनु मांहीं समावे। यदि आतम परिछिन्न न होगा, हो न सके संयोग वियोगा। जागृत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था, जन्म मरण की मिटे व्यवस्था। सूक्षम अति सूक्षम भगवाना, प्रभु व्यापक सर्वज्ञ महाना। व्याप्य जीव व्यापक जगदीशा, या विधि वर्णन करें मुनीशा। प्रश्न व्यापक व्याप्य संबंध नहीं, जीवेश्वर का होय। एक वस्तु के स्थान में, रह नहीं सकतीं दोय।। उत्तर यह नियम तँह घट सके, जहां समान आकार। जहां न रूप समान हों, वहां कछु अन्य व्यौहार।। चौपाई स्थूल लोह अरु सूक्ष्म बसंतर, रहे अग्नि लोहे के अंतर। दोनों रहते इक अवकाशे, तिमि आतम में प्रभु निवासे। स्थूल जीव सूक्ष्म परमातम, व्याप्य जीव व्यापक परमातम। यहीं संबंध सेवक स्वामी का, शासक शासित अनुगामी का। पिता पुत्र भी या विधि जाने, आधार आधेय प्रमाने। प्रश्न जीव ब्रह्म नहीं पृथक हैं, करते वेद बखान। अधो लिखित यह वाक्य हैं, वेदों के परमान।। प्रज्ञानं ब्रह्म।। 1।। अहं ब्रह्मास्मि।। 2।। तत्त्वमसि।। 3।। अयमात्मा ब्रह्म।। 4।। उत्तर यह तो वेद वाक्य नहीं भाई, बात करो क्यों सुनी सुनाई। यह ब्राह्मण ग्रन्थों के वचना, पारब्रह्म प्रभु की नहीं रचना।। दोहा ब्रह्म नहीं ब्रह्मस्थ मैं, प्रभु में करहुं निवास। यहां उपाधि तात्स्थ्य, करती अर्थ प्रकाश।। चौपाई ज्यौं कहते क्रोशत चरपाई, तात्पर्य क्या इसमें भाई। जड़ खटिया नहीं करत पुकारा, बोले खट पर पर बैठन हारा।। प्रश्न सभी वस्तु ब्रह्मस्थ हैं, नहीं कोई जीव विशेष। जीवहिं को ब्रह्मस्थ क्यों, कहते हो अवशेष।। उत्तर हैं ईश्वर में सभी पदारथ, निस्संशय यह बात यथारथ। जीव निकट ईश्वर के जेता, नहीं कोई द्रव्य निकट है तेता। जीवहिं में ईश्वर को ज्ञाना, अन्य नहीं जीव समाना। दोहा साक्षात्सबंध से, रहे ब्रह्म में जीव। मुक्ति पद को प्राप्त कर, गहे मोक्ष सुख जीव।। चौपाई ताँते जीव ब्रह्म न एका, ब्रह्म एक अरु जीव अनेका। दोहा जैसे कोई प्रेमी कहे, हम दोनों हैं एक। तैसा ही यह वचन है, हिय में करें विवेक।। चौपाई ब्रह्म मांहि जब लगे समाधि, तनु की भूले भक्त उपाधि। सुख वारिधि में मग्न पुकारे, मैं अरु ब्रह्म एक नहीं न्यारे। दोनों थित तब इक अवकाशे, ब्रह्म तेज मुख पांहि प्रकाशे। प्रभु के गुण अरु कर्म स्वभावा, जाके निर्मल हृदय समावा। वह कह सकता है सहधर्मी, वही भक्त जित मृत्यु सुकर्मी। उड़ा द्वैत हम दोनों में का, मैं मेरा प्रभु दोनों एका। प्रश्न तत्त्वमसि इस वाक्य का, स्पष्ट विषद यह अर्थ। अहो जीव तू ब्रह्म है, पूरन सकल समर्थ।। उत्तर ‘तत्’ का अर्थ ब्रह्म किम कीना, अनुवृत ब्रह्म कहाँ से लीना। ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं ब्रह्म।।’ वाक्य ‘सदेव सोम्य’ यह पूरव, अहो तुम्हारे अर्थ अपूरव। दोहा छान्दोग्य उपनिषद का, यह है अर्थ प्रमान। ब्रह्म शब्द इस में नहीं, पढ़िये धर कर ध्यान।। सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।। ब्रह्म शब्द इत लिखा न भाई, अनुवृत्ति कित से इत लाई। सुनहु अर्थ ‘तत्’ पद के जैसे, शास्त्र लिखित हौं वर्णहुं तैसे। स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्य स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति।। – छान्दो0 प्र0 6। खं0 8 । मं0 6-7 श्वेत केतु हे सुत मम प्यारे, पारब्रह्म ज्ञातव्य हमारे। सूक्षम से सूक्षम परमातम, जीवन जग का है प्रभु आतम। निज आतम का आतम प्यारा, सुख स्वरूप प्रभु जगदाधारा। “तदात्मकस्तदर्न्तर्यामी त्वमसि।” दोहा वह प्रभु परमातम वही, मन की जानन हार। उस ईश्वर से यु७ तू, हे सुत तनिक विचार।। चौपाई यही अर्थ सत्य को मूला, अरु उपनिषदों के अनुकूला। य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरम्। य आत्मानमन्तरो यमयति स तऽआत्मान्तर्याम्यमृतः।। – बृहदारण्यक याज्ञवल्क्य मुनि निज नारीसों, वचन कहें पतनी प्यारी सों। सुन मैत्रेयी तुझे सुनाऊं, प्रभु के तुझ को दर्स कराऊं। आतम थित परमातम प्यारी, प्रभु शक्ति आतम ते न्यारी। जीव मूढ़ नहीं वाको जाने, अंदर है पर नहीं पहचाने। जैसे जीव रहे तनु अन्दर, वैसे ही जीव प्रभु का मंदर। भीतर रह कर रहता न्यारा, साक्षि रूप बैठा प्रभु प्यारा। पाप पुण्य के फल का दाता, नियम मांहि जीवों को लाता। वही अविनाशी अन्तर्यामी, तेरे मन में रहता स्वामी। उसे जान वह जानन जोगू, वाके दरस हेत तप योगू। इसी भाँति के अगनित वचना, जिनकी कीनी मुनिंगण रचना। कौन व्य७ि उनको झुठलावे, उल्टे अर्थ कौन कर पावे। दोहा जे नूतन वेदान्ती, उल्टा तिन का ज्ञान। ब्रह्म बह्म निज को कहें, कर मिथ्या अभिमान।। प्रश्न अनेनात्मना जीवेनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि।। 1।। – छां0 प्र0 6। खं0 3। मं0 2 तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।। – तैत्तिरीय ब्रह्मान, अनु0 6 दोहा प्रथम जगत अरु तनु रचे, उनमें किया प्रवेश। जीव बना लील्हा रची, धरौं रूप बहु भेश।। चौपाई स्वयं ब्रह्म यह वचन बखाने, अनिक श्रुति अरु मंत्र प्रमाने। कैसे इन के अर्थ करहुगे, अथवा अर्थ अनर्थ धरहुगे। उत्तर नहीं जानहु तुम वाक्य पदारथ, ताँते अर्थ न करहु यथारथ। इक प्रवेश दूसर अनुवेशा, ‘अनु’ कहिये ‘पश्चात प्रवेशा’। तनु प्रविष्ट जीवों के संगी, अनुप्रविष्ट ईश्वर बहु रंगी। वेद ज्ञान सब को दर्सावे, नाम रूप विद्या प्रगटावे। प्रथम जीव तनु में प्रविशावे, पुन उसमें निज जोति जगावे। ‘अनु’ पद का तुम अर्थ न जानो, तांते उल्टा अर्थ बखानो। उत्तर “सोऽयं देवदत्तो य उष्ण काले काश्यां दृष्टः स इदानीं प्रावृट् समये मथुरायां दृश्यते।” ग्रीष्म काल में देवदत, देखा काशी मांह। वर्षा में वा को लखा, मधु पुरि तरु की छांह।। चौपाई देश काल तज तनु कर लक्षित, देवदत्त ही भया विवक्षित। जीव ब्रह्म चेतनता नाते, एकहि ब्रह्म विवक्षित ताते। प्रभु का देश परोक्ष रु माया। काल उपाधि यह दर्साया। आतम का यह देश रु काला, अल्पज्ञता अविद्या वाला। सब उपाधि को जब तज डारो, चेतनता का लक्ष्य निहारो। केवल ब्रह्म उभय में जाने, भेद न इन में तनिक पछानें। भाग त्याग लक्षण से देखें, तब इन में कोउ भेद न पेखें। अल्प ज्ञान रु सर्व ज्ञाना, इन को तज कर धरिये ध्याना। लक्ष्य करें जब चेतन केवल, ब्रह्म अद्वैत रहे निर्केवल। दोहा लखहु उपाधि जब तलक, तब तक दीखत द्वैत। तोड़ उपाधि पिंजरा, ब्रह्म एक अद्वैत।। उत्तर पहले यह बतराइये, क्या है ब्रह्म स्वरूप। वह अनित्य जन्मे मरे, अथवा नित्य अनूप।। प्रश्न अहो उपाधि जन्य यह, दोनों कल्पित जान। हम अनित्य दोऊ गनें, दोऊ कल्पित मान।। उत्तर कहो उपाधि नित्य है, अथवा रहे अनित्य। किस विधि वर्णन करत है, वेद शास्त्र साहित्य।। प्रश्न जीवेशौ च विशुद्धाचिद् विभेदस्तु तयोर्द्वर्याः। अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादय : ।। 1।। कार्य्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः । कार्य्यकारणतां हित्वा पूर्णबोधोऽवशिष्यते।। 2।। – संक्षेप शारीरिक, शारीरिक भाष्य दोहा मानहिं हम वेदान्ती, यह छः द्रव्य अनादि। षट् द्रव्यन से भिन्न सब, गनहिं पदारथ सादि।। चौपाई जीव ब्रह्म ईश्वर अज्ञाना, चारहुं द्रव्य अनादि समाना। जीवेश्वर को भेद विशोखा, प०चम द्रव्य अनादी देखा। योग अविद्या का चेतन से, वेदान्ती अस मानहिं मन से। केवल ब्रह्म अनादि अनन्ता, शेष पाँच का होवे अन्ता। हैं अनादि पर अन्तों वाले, केवल ब्रह्म अनन्त निराले। इन पांचों का प्राक् अभावा, इनके संग अविद्या भावा। आदि न इनका जाना जाए, ताँते पंच अनादि कहाए। पांचों नशहिं होय जब ज्ञाना, ताँते सान्त पांच को माना। उत्तर यह जो ऊपर लिखे तुम, दोनों श्लोक अशुद्ध। तर्क यु७ि से सिद्ध नहीं, माने कौन प्रबुद्ध।। चौपाई जुड़े न आय अविद्या जब लग, जीव सिद्धि नहीं होते तब लग। सिद्ध न माया के बिन ईश्वर, माया जुड़े तो हो जगदीश्वर। इस प्रकार सिद्धान्त तुम्हारा, जिसका नाहीं कोई आघारा। मान लेंय यदि इसे यथारथ, सिद्ध न हो पुन छठा पदारथ। मिलते ब्रह्म अविद्या माया, तौ बनती ईश्वर की काया। तीनों का सम्मिश्रण ईश्वर, तीन बिना नहीं हो जगदीश्वर। पुन क्यों ईश्वर भिन्न बताओ, ब्रह्म अविद्या से अलगाओ। त्तांते सिद्ध न छहो पदारथ, दोऊ सिद्ध अरु शेष अकारथ। एकहु ब्रह्म अविद्या अपरा, छः पदार्थ माने कोऊ बपरा। दोहा कारण कार्य उपाधि से, ब्रह्म जीव की सिद्धि। तब होवे जब ब्रह्म में, हो अज्ञान प्रसिद्धि।। चौपाई जाको काऊ अन्त न पावा, शुद्ध बुद्ध जो मु७ स्वभावा। ऐसो ब्रह्म नित्य भगवाना, सिद्ध करें उसमें अज्ञाना। दोहा यदि वाके इक देश में, मानोगे अज्ञान। तौ सगरा नहीं हो सके, शुद्ध ब्रह्म भगवान।। चौपाई एक देश अपना नहीं जानत, अपने को नहीं आप पछानत। एक देश में यदि अज्ञाना, तौ परिच्छिन्न होय भगवाना। जो परिछिन्न सो आवे जावे, किमि व्यापक सर्वज्ञ कहावे। जँह जँह जावे वँह अज्ञानी, जित जित छोड़े उत उत ज्ञानी। शुद्ध ज्ञान युत कँह पुन पहिये, कहाँ ब्रह्म के दर्सन लहिये। दोहा जहाँ सीमा अज्ञान की, वहँ का जो भगवान। तिसको ज्ञान न हो सके, होवेगा अज्ञान।। चौपाई कहीं ज्ञानी अरु कहीं अज्ञानी, ब्रह्म बने तब नाना खानी। बाहर भीतर ब्रह्म समाये, खण्ड खण्ड बाको ह्नै जाये। खण्ड खण्ड होने से हानी, कहीं ज्ञानी अरु कही अज्ञानी। जो खण्डित तो ज्ञान गँवावे, खण्ड बिना ज्ञानी कहलावे। क्या फल इसका तनिक विचारें, ताँते अपनी भूल सुधारें। ज्ञानाभाव ज्ञान विपरीता, यह भी गुण हैं मोरे मीता। गुण रहता है द्रव्य सहारे, नित्यसबंध दोनों का प्यारे। दोहा यदि अस मानें तौ रहे, नित्सबंध समवाय। पुन अनित्य नहीं हो सके, नित्सबंध को पाय।। चौपाई तनु को एक ठौर जिमि घावा, सगरो तनु वा ते दुःख पावा।। तेहि विधि एक देश अज्ञाना, सकल ब्रह्म को दे दुख नाना। दुख सुख अनुभव करके सारा, कार्य्योपाधि योग दुआरा। ब्रह्म ही जीव बना तत्काले, यदि ऐसा सिद्धान्त निकाले। तौ तुम से इक प्रश्न हमारा, कहिये कैसा ब्रह्म तुम्हारा। कैसे रूप यु७ परमेश्वर, परिच्छिन्न विभु व सर्वेश्वर। दोहा जो व्यापक मानो उसे, अरु उपाधि परिछिन्न। इक देशी अर्थात् वे, पृथक पृथक अरु भिन्न।। यदि ऐसा तुम निज मत मानो, पृथक पृथक इक देशी जानो। अन्तः करण गति पुन कहिये, चले फिरे या निश्चल गहिये। अन्तः करण कहो यदि चलता, इसकी मानहु नहीं अचलता। ब्रह्महु संग चले या नाहीं, क्या सम्मति तुमरे मत माहीं। प्रश्न चले फिरे अन्तः करण, ब्रह्म अकम्प अडोल। कार्य्योपाधि स०चरे, रहती डावाँ डोल।। उत्तर यदि ऐसा पुन उत्तर दीजो, न्याय हेतु से निर्णय कीजो। अन्तः करण तजे जो स्थाना, तँह का ब्रह्म तजे अज्ञाना। जौन स्थान पर पुन वह प्रापे, वहाँ प्रभु को अज्ञान वियापे। क्षण ज्ञानी अज्ञानी छन में, ब्रह्म होय कछु सोचें मन में। क्षनिक होय पुन बंधन मु७ि, ताँते उचित न ऐसि उ७ि। अन्य दृष्ट जिमि अन्य न जाने, कल की वस्तु जिमि आज भुलाने। जब जँह देखा अरु सुन पाया, अब वह देश काल बदलाया। बदला देश स्मरण नहीं आवे, परिवर्तन सब ज्ञान भुलावे। एक ब्रह्म यदि ऐसा कहते, तो सर्वज्ञ न क्यो ंप्रभु रहते। अन्तः करण अनिक यदि मानो, इस से भिन्न भिन्न पहचानो। अन्तः करण न चेतन माना, जड़ को होय असम्भव ज्ञाना। प्रश्न केवल ब्रह्म ज्ञान से हीना, केवल चित भी ज्ञान विहीना। दोहा जब जब अन्तः करण में, करता ब्रह्म निवास। तब तब वा को ज्ञान हो, ईश्वर चित आभास।। उत्तर तौ भी चेतन को हो ज्ञाना, अन्तः करण दुआरा माना। क्यों पुन अल्प नेत्र के द्वारा, ब्रह्म हुआ अल्पज्ञ तुम्हारा। ताँते नहीं तुम सिद्ध विचारा, कारण कार्य्य उपाधि द्वारा। ब्रह्म जीव ईश्वर किमि साधहु, क्यों कर शुद्धब्रह्म आराधहु। दोहा जिसको ब्रह्म पुकारते, सो ईश्वर को नाम। उससे भिन्न अनादि अज, अमर जीव अभिराम।। चौपाई चिदाभास पुन जीव कहावे, यह तुमरे मत में यदि भावे। चिदाभास तो है क्षण भंगी, नष्ट जीव हो चित का संगी। भोगे कौन मु७ि सुख भाई, चिदाभास नास ह्नै जाई। ब्रह्म जीव बनता नहीं ताते, जीव ब्रह्म का पद नहीं पाते। प्रश्न तो ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’।। -छान्दोग्य0 दोहा छान्दोग्य उपनिषद का, ऊपर लिखा प्रमान। करे सिद्धि अद्वैत की, तजहु द्वैत का भान।। चौपाई एक ब्रह्म मन्तव्य हमारा, एकहि का है सकल पसारा। सकल अवयवन भेद न वाके, पृथक वस्तु नाहीं कोई ताके। कोऊ सजाति न कोऊ विजाती, भिन्न न उससे हमें लखाती। गनहु जीव को यदि अतिरेका, फिर तो होवें द्रव्य अनेका। कैसे सिद्ध होय अद्वैता, जीव गनहिं तो होवे द्वैता। उत्तर क्यों भयभीत भये इस भ्रम से, लखहु विशेष्य विशेषण क्रम से। है अद्वैत विशेषण वाको, कोऊ समान नहीं है जाको। यहां विशेषण गुण परगासे, द्वैत भाव ईश्वर का नासे। जग में जीव रु तत्त्व अनेका, उन सों पृथक करे प्रभु एका। यहां विशेषण भया विभेदक, जीवादिक तत्त्वों से भेदक। अहो निरर्थक भ्रम से डरते, द्वै विध कार्य विशेषण करते। दोहा रहे नगर में देवदत, अद्वितीय धनवान। अथवा विक्रम सैन्य में, अद्वितीय बलवान।। चौपाई इस का अर्थ यही सब जानें, देवदत्त बड़ धनपति मानें। सर्वोत्तम इक विक्रम वीरा, दरसे रण में अद्भुत धीरा। नहीं दोनो ंके कोऊ समाना, इन ते न्यून सभी को माना। शेष जनों का नहीं निषेधा, दर्सांया केवल इक भेदा। अद्वितीय वैसे भगवाना, जीवादिक नहीं ताहि समाना। नहीं निषेध उन का कहीं कीना, केवल प्रभु से वे सब हीना। ताते ब्रह्म सिद्ध है एका, जीवरु प्रकृति द्रत्र्य अनेका। शब्दाद्वैत उसे अलगावे, अद्वितीय यूं ब्रह्म कहावे। नहीं निषिद्ध पुन शेष पदारथ, जीव जगत्त हैं सभी यथारथ। नहीं यह सगरे ब्रह्म समाना, इन सब से है ब्रह्म महाना। प्रश्न प्रभु सत्चित् आनन्द है, सब भूपों का भूप। जीवहु ब्रह्म समान है, अस्ति भाति प्रिय रूप।। चौपाई दोनों के गुण एक समाना, पुन क्यों पृथक जीव को माना। दोनों नित चेतन सुख रूपा, क्यों नहीं दोनों एक स्वरूपा। उत्तर वरू कि०िचत् साधर्म्य से, हो नहीं सकते एक। जीव ब्रह्म के गुणों में, होते भेद अनेक।। चौपाई जड़ अरु दृश्य भूमि है जैसे, अग्नि अरु जल भी हैं वैसे। पर इतने में होंय न एका, हैं इन में वैधर्म्य अनेका। गंधि रूक्षता अरु कठिनाई, पृथिवी के यह गुण हैं भाई। जल में रस कोमलता द्रवता, इनके कारण पानी स्त्रवता। रूप दाह अग्नि के धर्मा, जिन से करे अग्नि सब कर्मा। तीनहुं द्रव्य न एक कहावें, यद्यपि कुछ समानता पावें। हस्त पाद नेत्र अरु काना, कीड़ी के भी मनुष समाना। पर मनुष्य कीड़ी तो नाहीं, बहु अंतर है दोनों माहीं। मानुष तो है द्वै पगधारी, च्यूँटी होय अनिक पगवारी। वह चलता वह भू पर मसके, वह दौड़े वह रेंगत खसके। दोनों नहीं समान आकारा, रूप रुंग दोनों का न्यारा। जीव ब्रह्म भी ऐसे जानो, भिन्न भिन्न दोनों को मानो। ज्ञान क्रिया में प्रभु अनन्ता, व्यापक वा को आदि न अंता। कहाँ जीव अल्पज्ञ बेचारा, अल्प रूप का राखन हारा। भ्रान्तिवान परिछिन्न स्वरूपा, कैसे पाप ब्रह्म को रूपा। ताँते ब्रह्म जीव न एका, एक ब्रह्म अरु जीव अनेका। अथोदरमन्तरंकुरुते, अथ तस्य भयं भवति। द्वितीयाद्वै भयं भवति।। -बृहदारण्यक जो जन ब्रह्म रु जीव में, करे तनिक भी भेद। दूसर को लख वह डरे, भय कंपित तनु स्वेद।। चौपाई दूसर ही है भय का कारण, ताते दूसर करो निवारण। निर्भय आप ही आप अकेला, भेस भेस में आप ही खेला। दोहा जो प्रभु को माने नहीं, या माने परिछिन्न। अभिमानी वा हानि कर, वह नर होवे क्लिन्न।। चौपाई जो नर प्रभु का करे विरोधा, जिसके मन में द्वेष रु क्रोधा। वृथा जगत से वैर बढ़ाए, वह नर औरों से दुख पाए। प्रेम सहित जो हिल मिल रहता, काहू को दुर्वचन न कहता। प्रभु की आज्ञा शिर पर धरता, सदा मलाई जग की करता। कोऊ विरोध नहीं राखे मनमें, ऐक्यभाव रखता जन जन में। वे सगरे भी एक कहावें, मन में द्वितीय भाव नहीं लावें। वे नर भय नहीं करें कदाचित, निर्भय उनका रहे सदा चित। दोहा यज्ञ दत्त और देवदत, विष्णु मित्र जिमि एक। तीनों के मत एक हैं, यद्यपि पिंड अनेक।। चौपाई यह तीनों जिमि एक कहावें, नहीं विरोध इनमें कछु पावें। है विरोध में दुख अरु शूला, प्रेम भाव ही सुख को मूला। प्रश्न ब्रह्म जीव बतलाइये, रहते सदा अनेक। अथवा कोऊ कोऊ काल में, हो जाते हैं एक।। उत्तर निश्चय अन्वय भाव से, होते दोनों एक। पृथक पृथक दोनों करे, पुनः भाव व्यतिरेक।। चौपाई जिमि आकाश है विभु अमूरत, उस में वस्तु बसे जड़ मूरत। दोनों कभी पृथक नहीं रहते, इसे एकता इनकी कहते। पर सूक्ष्म आकाश अनन्ता, व्यापक अलख आदि नहीं अन्ता। अरु मूरत जड़ वस्तु लखावे, स्थूल एक देशी दर्सावे। यह वैधर्म्य भेद कर डारे, करत उभय को न्यारे न्यारे। तिस विधि व्यापक ब्रह्म पछानो, जीव जगत सब उसमें मानो। वरू स्वरूप से उभय अनेका, इस विधि भेद करे व्यतिरेका। जब लग नाहींगृह निर्माणा, बिखरे पड़े पदारथ नाना। तब भी सब रहते आकासे, विभु आकाश सब माँहि निवासे। जब निर्माण भया घर सारा, जुड़ गये चूना पत्थर गारा। व्यापक उसमें भी आकाशा, दिग दिगन्त पूरित सब आशा। जब कबहुं पुन गृह गिर जावे, पुन आकाश तिस माँहि समावे। अलग न हो आकाश त्रिकाला, पर स्वरूप से पृथक निराला। एहि विधि ब्रह्म जीव संसारा, है स्वरूप तीनों का न्यारा। तीनहुं काल न होवें एका, पृथक पृथक सब भिन्न अनेका। दोहा काणे सब वेदान्ती, आज कल्ह के जान। अन्वय से ही देखते, जीव जगत भगवान।। चौपाई बंद आँख व्यतिरेक न देखे, एक आँख अन्वय को पेखे। द्रव्य न कोऊ अस संसारे, पक्ष न जा के न्यारे न्यारे। निगुण सगुण अन्वय व्यतिरेका, ताँते मन में करी विवेका। जँह साधर्म्य विधर्म वहाँ हैं, उभय पक्ष बिन द्रव्य कहाँ हैं। प्रश्न सगुण रूप वह ब्रह्म है, अथवा निर्गुण रूप। कैसा तुमरे पंथ में, वा को रूप अनूप।। उत्तर निगुण सगुण द्वै रूप हैं, करते वेद बखान। उभय रूप से राजते, रोम रोम भगवान।। प्रश्न एक म्यान में दो तलवारें, किमि रह सकतीं तनिक विचारें। वही निर्गुण वही सगुण कहावे, बात असंभव समझ न आवे। उत्तर रूपादिक गुण जिम जड़ माँही, पर ज्ञानादिक उसमें नाही। चेतन में वह रहता ज्ञाना, रूपादिक उसमें नहीं माना। जो गुण सहित सगुण तस कहिये, गुण विहीन को निर्गुण गहिये। निज स्वाभाविक गुणन समेता, सगुण नाम वाको अभिप्रेता। निगुण विरोधी गुण सों हीना, निर्गुण द्रव्य उसे कह दीना। निगुण सगुण हैं सभी पदारथ, यही तत्व अरूि यही यथारथ। अस पदार्थ कोउ जग में नाहीं, निगुण सगुणता जिस मेुं नाहीं। तेहि विधि परब्रह्म परमेश्वर, निर्गुण सगुण रूप सर्वेश्वर। बल अन्नत अरू ज्ञान अनन्ता, इस विध गुण राखे भगवन्ता। इन्हीं गुणों से सगुण कहावे, उसके गुण का अंत न आवे। रूप रंग अरू द्वेष न ताको, ताते निर्गुण कहते वाको। प्रश्न निराकार निर्गुण कहें, सगुण कहें साकार। बनर्गुण सगुण इस रीति से, कहता सब संसार।। चौपाई जन्म न लेते जब भगवाना, निगुण तिसे तिस काल बखाना। जन्म धार जब ले अवतारा, उसका ेसगुण कहे संसारा। उत्तर करें कल्पना इस तरह जो नर नहीं विद्वान। अण्ट संट बकते फिरें, मूरख मूढ़ समान।। चौपाई सन्निपात रोगी ज्वरी मांईं, जैसक बकता आँई बाँई। वैसे ही मूरख लिखते बकते, वृथा कथन ते नहीं झिझकते। प्रश्न अनुरागी परमात्मा, अथवा प्रभु विर७। भजन करे किस भाव से, परमेश्वर का भ७। उत्तर नहीं अनुरागे अरू नहीं त्यागे, राग त्याग वाको नहीं लागे। निज से भिन्न रू श्रेष्ठ पदारथ,उस स होवे राग सकारथ। प्रभु से भिन्न पदार्थ न कोई, अरू उससे कछु श्रेष्ठ न होई। ताते उसमें नहीं अनिुरागा, राग नहीं तो कहीं विरागा। अरू जो प्राप्त वस्तु का त्यागी, वाकी संज्ञा होय विरागी। प्रभु व्यापक तज सकता नाहीं, ओत प्रोत वह सब के मांहीं। तांते नहीं विर७ जगदीश्वर, राग त्याग राखे नहीं ईश्वर। प्रश्न इच्छा रहती ब्रह्म में, अथवा है निष्काम। यदि उस में इच्छा नहीं, कैसे चलते काम।। उत्तर कौन पदारथ प्राप्त न ताको, जाकी इच्छा होवे वाको। अथवा उत्तम कौन पदारथ, जिसकी इच्छा करे यथारथ। सकल वस्तु है उसके माहीं, ताते प्रभु को इच्छा नाहीं। वह तो पूरण सुख को धामा, सुख स्वरूप नहीं सुख को कामा। नहीं इच्छा, है उस में ईक्षण, सकल सृष्टि का ज्ञान समीक्षण। अथ वेद विषय यस्मादृचों अपातक्षन् यजुर्यस्स्मादपाकषन्। सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङिगरसो मुखं स्कम्भन्तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। – अथर्व0 कां0 10। प्रपा0 23। अनिु0 4। मं020 दोहा कानै देव जिसने किये, चारों वेद प्रकाश। जिसने प्रगटाये सकल, जल थल पवन आकाश।। स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।। -यजुः0 अ0 40। मं08 चौपाई वही स्वयम्भू शुद्ध सनातन, निराकार वह पुरूष पुरातन। जीवहुं दे शिक्षा भगवाना, जाते उसका हो कल्याना। ज्ञान देत वेदों के द्वारा, वही देव सांचा कर्तारा। प्रश्न निराकार वह प्रभु है, अथवा है साकार। निराकार मुख के बिना, वेदन सके उचार।। उत्तर सर्व श७ि मय है वह ईश्वर, व्यापक जीव मांहि जगदीश्वर। नहीं अपेक्षा मुख की वाको, जीव मात्र में वासा ताको। अन्तर्यांमी वह भगवाना, बिन मुख कहे सुने बिन काना। मुख से कहना तभी सकारथ, पृथक होय यदि कोई पदारथ। मन में उठते अनिक विचारा, क्या कोई मुख का लेत सहारा। बिन बोले बिन जीभ हिलाये, जीव काम सब करता जाए। जिह्ना करे शब्द नहीं धारण, मन में बातें होत उचारण। बंद करें अंगुरी से काना, शब्द सुने नाना कर ध्याना। एहि विधि जीवहुं अन्तर्यामी, वेद ज्ञान दीना तस स्वामी। जब दूजे को हो समझाना, तब मुख को आवश्यक माना। दोहा व्यापक अंदर जीव के, रहता है भगवान। करे प्रकाशित जीव में, पूर्ण वेद का ज्ञान।। प्रश्न किन के आतम में प्रभु, कीना वेद प्रकाश। उन पुरुषों के नाम क्या, वेद कहे जिन पास।। उत्तर अग्नि वायु आदित्य अरू, ऋषि अंगिरस महान्। इन्हें सृष्टि के आदि में, भया वेद का ज्ञान।। प्रश्न यो वै ब्रह्ममाणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।। -श्वेताश्वतर अ0 6 । मं018 प्रश्न ब्रह्मा जी के हृदय में, प्रथम किया परगास। ऐसा लिखते उपनिषद्, करें न क्यों विश्वास।। उत्तर ब्रह्मा जू के हृदय में कीने स्थापित वेद। अग्नि आदि ऋषि जनों ने, खोला मनु ने भेद। अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोहयज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुः सामलक्षणम्।। -मनुः 1। 23 चौपाई अग्नि आदि ऋषियों के द्वारा, प्रभु ने जग में वेद प्रसारा। उन से पुन ब्रह्मा ने लीने, यज्ञ सिद्धि के हेतु दीने। चारहुं ऋग् यजु थर्वण सामा, इस प्रकार आये इस धामा। प्रश्न उत चारों के हृदय में, क्यों कीने परगास। क्यों नहीं प्रभु स्थापित किये, अन्य किसी के पास।। चौपाई पक्षपात क्यों प्रभु के मन में, भेद रखा उस ने जन जन में। कहो वही थे उस के प्यारे, वही चार क्यों प्रभु ने तारे। उत्तर सब जीवो में वही थे, पावन जीव महान। ताते उनके हृदय में, किया वेद का ज्ञान।। प्रश्न बहुत देश हैं इस संसारे, भाव भेष भाषा में न्यारे। केवल संस्कृत प्रभु को भाई, क्या संस्कृत में लखी बड़ाई। संस्कृत में कीना परगासा, और नहीं क्या कोई भासा। है समान सब का कर्तारा, क्यों पुन पक्षपात मन धारा। उत्तर संस्कृत किसी देश का नाहीं, पक्षपात नहीं प्रभु मन माहीं। किसी देश की भाषा अन्दर, देता वेदहुं प्रभु पुरंदर। तब तौ एक देश सुख पाता, ज्ञान गंग में एक नहाता। शेष देश पाते कठिनाई, दुर्गम होती उन्हें पढ़ाई। वैदिक भाषा सब की माता, हर भाषा का इस से नाता। सब के हित ज्यों प्रभु की भूमि, भारतीय हो शामी रूमी। सभी देश सब वस्तु पावें, इक सम सारे लाभ उठावें। इस विधि इक सम सब की भाषा, संस्कृत में हैं वेद प्रकाशा। जो चाहें वैदिक प्रज्ञाना, करें परिश्रम सभी समाना। प्रश्न आदि सृष्टि में प्रभु ने, किये वेद निर्माण। अन्य किसी ने नहीं रचे, इस में क्या परमाण।। उत्तर जैसा ईश्वर पावन प्यारा, सद् विद्या का जानन हारा। पावन गुण अरु कर्म सुभाऊ, न्याय शील राउन को राऊ। जो पुस्तक उन के अनुकूला, कथन करे सब सत को मूला। वही ग्रन्थ ईश्वर कृत जानो, अन्य न प्रभु की रचना मानो। दोहा जिस पुस्तक में सृष्टि क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमान। आप्त क्रिया प्रतिकूल नहीं, सो ईश्वर का ज्ञान।। चौपाई जैसा निर्भ्रम प्रभु का ज्ञाना, वैसा जिसमें होय समाना। वह पुस्तक प्रभु कृत निर्माणा, माननीय अरु वही प्रमाणा। जैसा है ईश्वर को रूपा, सृष्टि को क्रम यथा अनूपा। वैसा रूप अरु क्रम जो वरणे, वैसा सत्य सत्य अवतरणे। सृष्टि कार्य कारण अरु आतम, प्रतिपादे क्रम से परमातम। ताको हम ईश्वर कृत मानें, वही सत्य जानें परमाने। दोहा प्रत्यक्षादि प्रमाण से, जो नाहीं प्रतिकूल। अरु शुद्धात्म स्वरूप को, वर्णो जो अनुकूल।। चौपाई सोई जान ईश्वर को वेदा, ऋषि मुनि जाके पाँय न भेदा। नहीं अंजीला पुराण कुराना, तीन काल ईश्वर को ज्ञाना। प्रश्न क्या आवश्यकता पड़ी, रचे वेद भगवान। धीरे धीरे पुरुष का, बढ़ जाता है ज्ञान।। चौपाई ज्ञान पुरुष का जब बढ़ जावे, तब वह पुस्तक स्वयं बनावे। लाखों जन जिन वेद न देखे, उनके रचित ग्रन्थ हम पेखे। उत्तर शिक्षा बिन नहीं होवे ज्ञाना, महा असम्भव ग्रन्थ बनाना। बिन कारण कोऊ कारज नहीं, कुछ सोचों अपने मन माहीं। दोहा बिना पढ़े नहीं हो सके, कोई पुरुष विद्वान। नित का अनुभव यही है, क्यों बनते अनजान।। चौपाई आदि सृष्टि में यदि जगदीश्वर, वेद न देता उनको ईश्वर। ऋषि पुन अवरहिं नहीं पढ़ाते, मनुष मात्र मूरख रह जाते। जांङगल जन नितरहें अजाने, सृष्टि लखें पर होंय न स्याने। जो कोई इन में विद्या पाता, वह जांङगल ज्ञानी बन जाता। जैसे नर कोऊ पशु गण मांहीं, रहे सहे कछु जाने नाहीं। वेद शास्त्र विद्या क्या जानें, नर की बोली नहीं पहचाने। पशुओं में रह पशु हो जावे, अपना मानुष रूप भुलावे। जानहिं भील कोल सन्थाला, भैंस बरोबर अक्षर काला।। दोहा जब लग आर्यावर्त से, गया न बाहर ज्ञान। तब लग मूरख थे सभी, यूरुप मिसर युनान।। चौपाई जब भारत से शिक्षा पाई, हमने विद्या सुधा पिलाई। ज्यों ज्यों विद्या बढ़ने लागी, आज बने जग में बड़भागी। आदि काल में विद्या पाकर, चार ऋषि भये ज्ञान दिवाकर। उन से फैला ज्ञान प्रकाशा, दिगदिगन्त चमकीं सब आशा। स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।। -योग0 सू0 समाधि पादे सू0 26 चौपाई ज्यों अध्यापक हमें पढ़ावें, हम औरों को पुनः सिखावें। परम्परा यह चलती आई, आदि सृष्टि से अब लग भाई। गुरुओं का गुरू वह भगवाना, आदि कला जिस दीन्यो ज्ञाना। जैसे दशा सुषुप्ति माहीं, ज्ञान जीव को रहता नाहीं। प्रभु न होय तैसे अज्ञानी, ज्ञान रूप जगदीश्वर ज्ञानी। वह आदिम वही ज्ञान का कारण, ज्ञान सूर्य अज्ञान निवारण। ताँते इस विधि निश्चय जानो, बिन कारण कारज मत मानो। प्रश्न संस्कृत भाषा में चतुर, वेद दिये प्रगटाय। ऋषि नहीं संस्कृत जानते, समझे कौन उपाय।। उत्तर ऋषि मुनि थे योगी धर्मातम, ध्यान मग्न देखें परमातम। जब समाधि में ध्यान लगाया, प्रभु ने मन्त्र भाव दर्साया। ज्यों ज्यों इच्छा करने लागे, सुप्त भाव मन्त्रों के जागे। जब वेदार्थ अनिक जन जाने, ब्राह्म ग्रन्थ पुनः निर्माने। उन में अर्थ और इतिहासा, ऋषि मुनियों का सकल प्रकासा। ‘ब्रह्म’ नाम वेदों का भाई, ब्राह्म जिन में व्याख्या गाई। ऋषयो मन्त्रदृष्टयः मन्त्रान्सम्प्रादुः। -निरु७ 1। 20 दोहा जिस ऋषि ने जिस मंत्र का, कीना अर्थ प्रकास। वही द्रष्टा उस मंत्र का, रखिये यूं विश्वास।। चौपाई जिस ने प्रथम लखे मंत्रारथ, अर्थ प्रदर्शक वही यथारथ। ऋषि जन नहीं मंत्रों के कर्ता, वे तो केवल अर्थ वितर्ता। प्रथम अर्थ दर्शन जिस कीना, वाको नाम मंत्र संग दीना। प्रश्न किन ग्रथों का नाम है, जिन को कहते वेद। साफ़ साफ़ बतलाइये, कितने उन के भेद।। उत्तर ऋग् यजु साम अथर्व यह, चार वेद अभिराम। मंत्र संहिता मात्र का, वेद जानिये नाम।। प्रश्न मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।। अनिक प्रतिज्ञा सूत्र हैं, कात्यायन परणीत। इन में ब्राह्मण ग्रंथ को, वेद कथन की रीत।। उत्तर संहिता को टुक देखिये, जंह पुस्तक का आद। पुन अध्याय समाप्ति पर, लिखा वेद निर्वाद।। चौपाई ब्राह्मण ग्रन्थ आदि में देखें, पुन अध्याय, अंत पर पेखें। कहीं वेद का शब्द न आया, वृथा तुम्हारा चित भरमाया। टुक निरु७ पुस्तक को खोलें, यास्क मुनि उस में क्या बोलें। इत्यापि निगमो भवति।। इति ब्राह्मणम्।। -नि0 अ0 5। खं0 3-4 छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि।। -अष्टाध्यायी। 4-2-66 दोहा इन सूत्रों में स्पष्ट है, मंत्र भागा है वेद। अरु ब्राह्मण व्याख्यान हैं, यह दोनों में भेद।। चौपाई यदि विशेष कुछ देखा चाहें, भाष्य भूमिका मोर उठाएं। वहां सिद्ध मैंने यह कीना, सप्रमाण अरु हेतु दीना। कात्यायन की नहीं यह वानी, हेतु यु७ि द्वारा सब छानी। यदि हम उसे प्रमाणिक कहते, वेद न पुनः सनातन रहते। ब्राह्मण में इतिहास लखावें, कथा अनेकों उन में पावें। ऋषि मुनियों की अनिक कथाएं, नृपति कथा वँह सुने सुनाएं। जब लग कोई नर जन्म न धारे, कौन कथा वाकी लिख डारे। पहले प्राणी बाद कहानी, सत्य बात यह सब जग जानी। वेदों में इतिहास न आवें, विद्या बोधक शब्द लखावें। कथा कहानी को क्या कामा, निर विशेष का आय न नामा। प्रश्न कितनी शाखा वेद की, मानत नर विद्वान। कैसे शाखा बन गईं, कैसे भया विज्ञान।। उत्तर ग्यारह सौ सत्ताइस शाखा, ऋषि मुनियों ने ऐसे भाखा। व्याख्यान शाखा को नामा, ऋषि गण व्याख्या की अभिरामा। प्रश्न अंग भूत वेदों की शाखा, पंडित जन ने ऐसा भाखा। आप कहें इन को विख्याना, यह तो नहीं किसी ने माना। उत्तर इस पर कीजे तनिक विचारा, नहीं इस में कोऊ अन्तर भारा। वेदों की शाखायें जेती, ऋषि नामों संग आई तेतीं। जैसे आश्वलायनी। कहिये, आश्वलायन व्याख्या नित गहिये। मंत्रों की लें राख प्रतीका, व्याख्या वाकी करते नीका। देखें जिस विधि तैत्तिरि शाखा, “इषे त्वोर्जे” पहले राखा। रख प्रतीक पुन व्याख्या कीनी, बिन प्रतीक कबहुँ नहीं दीनी। नहीं प्रतीक वेदों में आई, ताँते वेद प्रभु कृत भाई। यदि विशेष कोऊ चाहत जाना, भाष्य भूमिका पढ़े सुजाना। माता पिता जिमि बड़े दयालु, सुत की उन्नति चहें कृपालु। त्यों अनुकंपा प्रभु ने कीनी, विद्या वेद जगत हित दीनी। मन का जिससे मिटे अँधेरा, रात्रि मिटे अरु होय सवेरा। भ्रम अरु मोह जाल सब टूटें, मनुष्य मात्र निर्भय सुख लूटें। विद्या सुख की होवे वृद्धि, प्राप्त होय व ऋद्धि सिद्धि। प्रश्न कहिये वेद अनित्य हैं, अथवा नित्य अकाल। पोथी पत्रे ग्रन्थ तो, जाएं काल की गाल।। उत्तर नित्य वेद, कबहुं नहीं नाशें, ज्ञान ज्योति जग मांहि प्रकाशें। ईश्वर नित्य नित्य तेहि ज्ञाना, मरे न जन्में वह भगवाना। जो जो नित्य पदार्थ कहावें, गुण भी वाके नाश न पावें। नित के गुण अरु कर्म स्वभावा, नित्य रहें तिन काल न खावा। जो अनित्य जग मांहीं, इस जग मांहीं वे थिर नाहीं। नहीं नित्य यह पत्रा पोथी, समय पाय हो जाये थोथी। स्याही उड़े पत्र हो जीरण, नशे ग्रन्थ पुन जीरण शीरण। केवल शब्द रु अर्थ सबंधा, नित्य रहे प्रभु ज्ञान प्रबंधा। प्रश्न दिया ज्ञान होगा ईश्वर ने, ऋषियों को उस जगदीश्वर ने। ऋषियों ने पुन वेद रचाये, निज बुद्धि से छन्द बनाये। उत्तर किस विधि हो सकता कहो, बिना ज्ञेय के ज्ञान। आदि सृष्टि में ज्ञेय को, जाने इक भगवान।। उत्तर गायत्री सों छन्द बनाना, षड्जादिक सब स्वर को ज्ञाना। स्वरित उदारत और अनुदात्ता, बिन प्रभु के नहीं था कोई ज्ञाता। भरे पड़े जिन में सब ज्ञाना, प्रभु बिन कौन करे निर्माना। पुन व्याकरण निरु७ रु छन्दा, पुस्तक मुनिगण रचे अमन्दा। विद्या का तब भया प्रचारा, एहि विधि जग में ज्ञान प्रसारा। प्रभु यदि करहि न वेद प्रकाशा, अन्धकार किमि होवे नाशा। कोई पुस्तक बन सकती नाहीं, बुद्धि न होती यदि नर माहीं। तांते ईश्वर वेद रचाये, निर्मल विद्या स्त्रोत बहाये। रे नर चलहु वेद अनुसारा, वेदों ने सब जग को तारा। जो पूछे मन्तव्य तुम्हारा, कह दो मत है वेद हमारा। केवल वेद वेद को माने, वेदों को सर्वोत्तम जाने। इति श्री आर्यमहाकवि जयगोपाल विरचित सत्यार्थप्रकाश कवितामृते सप्तमः समुल्लासः सम्पूर्णः।।